देवताओं और असुरों को महादेव अर्थात शिव प्रिय क्यों?
महादेव तात्पर्य देवों के देव महादेव अर्थात जो देवां के भी देव हैं और देवता भी जिनको पूजते हैं। इतना ही नहीं अपितु समस्त विश्व महादेव अर्थात शिव जी की अर्चना करता है। जब महादेव जी का नाम आता है तो सहसा ही नन्दी पर सवार उनकी एक अतुलनीय सुंदर व मोहक छवि मस्तिष्क में प्रकट हो जाती है और मन आत्म विभोर हो उठता है। महादेव समस्त देवों के भी प्रिय है और साथ ही शास्त्रों में भी इस बात का उल्लेख है कि देवों के साथ-साथ असुरों ने भी महादेव की तपस्या कर उनको प्रसन्न करके अनेक वरदान प्राप्त किये। अब प्रश्न यह उठता है कि देवों के साथ-साथ असुरों को भी महादेव प्रिय क्यों? इस पर विचार किया जाय तो निम्न बिन्दु प्रकाश में आते हैंः-
1. सर्व विदित है कि जब देवों और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था तो उस मंथन से सर्व प्रथम निकलने वाले कालकूट विष का पान एकमात्र महादेव जी ने ही किया और जन कल्याण के लिए विष का पान करने से उनका कण्ठ नीला पड़ जाने के कारण वह नीलकण्ठ और देवों के देव महादेव कहलाये।
2. महादेव निष्पक्ष है और उनकी निष्प़क्षता का इस से बड़ा साक्ष्य क्या होगा कि समुद्र मंथन से उत्पन्न कालकूट विष के ताप को स्वंय ही ग्रहण किया और अवशेष समस्त महत्वपूर्ण रत्नों(यथा-लक्ष्मी जी, जिन्होंने पति के रूप में श्री विष्णु भगवान को चुना, ऐरावत हाथी, जो देवराज इन्द्र को सौपा गया, इसी प्रकार के अनेक रत्न) को देवों और असुरों के सुपूर्द कर दिया, जिसमें अमृत जैसा अतुल्नीय रत्न भी सम्मिलित था।
3. शास्त्रों में इस बात का भी स्पष्ठ उल्लेख है कि जब चन्द्रदेव को उनके ससुर प्रजापति दक्ष(ब्रहमा भगवान के पुत्र) द्वारा शाप दिये जाने के कारण उनका शरीर क्षयरोग से गलने लगा तो चन्द्रदेव जी ने महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर अपनी भक्ति और तप से महादेव जी को प्रसन्न किया। इस प्रकार चन्द्रदेव जी की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव जी ने उनको अपने मस्तिक पर स्थापित कर चन्द्रदेव जी को अभयदान दिया और तभी चन्द्रदेव जी का अस्तित्व बच सका एवं आज चन्द्रदेव जो इस सृष्टि में प्रकाशमान हैं और सारा संसार जिस चन्द्र के दर्शन कर पाता है तो वह सिर्फ महोदव की कृपा के करण ही है। जिस स्थान पर चन्द्रदेव जी ने महादेव जी की आराधना की वहां उनके द्वारा निर्मित शिवलिंग को (चन्द्रदेव अर्थात सोम द्वारा पूजे जाने पर) बाबा सोमनाथ नाम पड़ा और आज भी विश्व के कोने-कोने से आने वाले भक्तों द्वारा बाबा सोमनाथ अर्थात महादेव जी के दर्शन करते हैं और उनकी कृपा के पात्र बनते हैं।
4. इसी प्रकार जब-जब असुरों ने महादेव की तपस्या की तो महादेव जी ने उनकी भक्ति और तप को भी स्वीकार किया और प्रसन्न होने पर उनको भी विभिन्न प्रकार के वरदानों से सुशोभित किया, जिसमें श्रृषि विर्श्वा के पुत्र रावण का नाम सर्वोपरि है, जिसमें महादेव जी को प्रसन्न करने के लिए अपने दशों शीशों को काट कर महादेव जी को भेंट कर दिया और महादेव जी को प्रसन्न कर लिया। प्रसन्न होने पर महादेव जी ने अपना शस्त्र भी रावण को वरदार स्वरूप प्रदान किया। इसके अतिरिक्त महादेव शिवलिंग के रूप में रावण के साथ उसकी नगरी लंका जाने को भी तैयार हो गये, किन्तु उक्त शिवलिंग को मार्ग में कहीं भी भूमि पर न रखने के वचन को पूरा न कर पाने के कारण उक्त शिवलिंग उसी स्थान पर स्थापित हो गया और उक्त शिवलिंग बाबा गोला गोकर्णनाथ के नाम से प्रचलित हुआ। आज भी रावण द्वारा पूजित महादेव अर्थात उक्त शिवलिंग अर्थात बाबा गोला गोकर्णनाथ के दर्शन करने हेतु विश्व के कोने-कोने से आने वाले भक्त की कृपा के पात्र बनते हैं।
5. इसी क्रम में जब देवों व असुरों को दण्डित करने की बात आती है तो शास्त्रों में इस तथ्य का भी उल्लेख है कि महादेव जी ने दवों तथा असुरों को समान रूप से दण्ड भी दिया। इस संबंध में शास्त्रों में उल्लेख है कि रावण में अपनी भक्ति व बल के अहंकार में कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओं से उठा लिया था तो महादेव जी ने अपने अंगूठे के बल से रावण की भुजाओं को कैलाश पर्वत की नीचे ही दबा दिया, जिस पर रावण अपार कष्ट से कराह उठा और चीत्कार करने लगा, किन्तु उसी अवस्था में रावण ने अपनी भक्ति स्वरूप शिव ताण्डव स्त्रोत की रचना की और महादेव जी प्रसन्न हुए तभी महादेव जी ने रावण को क्षमा किया और रावण का जीवन बच सका। इसी प्रकार जब देवराज इन्द्र देव गुरू वृहस्पतिदेव जी के साथ महोदव के दर्शन करने कैलाश पर्वत जा रहे थे तो देवराज इन्द ने दवताओं का राजा होने के कारण अपने अहंकार वश मार्ग में अधोर रूप में लेटे हुए महादेव जी को पहचाना नहीं और उनका अपमान कर दिया। जिस पर महादेव जी को क्रोध आ गया और देवरा इन्द्र को नष्ट करने हेतु महादेव जी के तीसरे नेत्र से क्रोधाग्नि प्रकट हो गयी, किन्तु देवगुरू वृहस्पति ने महादेव जी को पहचान लिया तथा देवराज इन्द्र से महादेव जी के क्रोध को शान्त करने हेतु क्षमा मांगने को कहा और देवराज इन्द्र के क्षमा मांगने पर महादेव जी ने अपने क्रोधग्नि से उत्पन्न ज्वाला को समुद्र में छोड़ दिया। इस प्रकार देवराज इन्द्र का जीवन बच सका। सिद्ध होता है कि जहाँ महोदव जी ने एक और देवों और असुरों का समान रूप से वरदान दिये तो वहीं दूसरी ओर उन्हें समान रूप से दण्डित भी किया।
शास्त्रों में विदित उपरोक्त घटनाओं से सिद्ध होता है कि महादेव अर्थात शिव जी ने कभी भी देवों और असुरों में भेदभाव नहीं किया। महादेव जी की निष्पक्षता का साक्ष्य उपरोक्त विदित वर्णनों से मिल ही जाता है। अतः यह स्वीकार किया जान समीचीन है कि देव हो अथवा दानव हो अथवा मनुष्य किसी भी वर्ण या जाति से संबंध रखता हो। चाहे मानव शरीर में जीवित प्राणी हो अथवा मृत होने अथवा शरीर छोड़ने के पश्चात विभिन्न योनियों में विचरण करने वाले प्राणी हो सभी भक्त महोदव के प्रिय हैं। महादेव अर्थात शिव जहाँ एक ओर मनुष्य योनि में जीवित भक्त का इस संसार में तथा शरीर छोड़ने के पश्चात भूत, प्रेत आदि विभिन्न योनियों में विचरण करने वालों का शमशान में कल्याण करते हैं। पूर्णतयः स्पष्ट है कि महादेव अर्थात शिव अपने समस्त भक्तों पर समान रूप से कृपा बरसाने वाले महादेव हैं और सभी के प्रिय हैं।
यह लेख उन सभी शिव भक्तों अर्थात महादेव भक्तों को समर्पित है, जिनके मन में यह शंका हो कि वह किसी विशेष वर्ण अथवा जाति से संबंध रखता है, जिन्हें पूर्ण सम्मान नहीं मिल पा रहा है और आज के परिवेश में भी जिनका कुत्सित भावना रखने वाले कुछ उच्च समाज के लोगों द्वारा समाज के साथ-साथ अथवा मंदिरों में भी भेदभाव व शोषण किया जा रहा है और निवेदन है उन उच्च वर्गीय समाज के लोगों से कि वह भक्तों के साभ महोदव अर्थात शिव भक्तों के साथ समानता अर्थात समता का भाव रखें। महादेव सभी का कल्याण करें। ऊँ नमः शिवाय।
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