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न जातु कामान्न भयान्न लोभादू धर्म त्यजे्जीवितस्यापि हेतोः।

नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये 

 

~ महाभारत

 

भावार्थ:- मनुष्य को किसी भी समय काम से, भय से, लोभ से या जीवन रक्षा के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, क्योंकि धर्म नित्य है और सुख दुःख अनित्य है

 

रोगशोकमृत्युयमा वपन्ते नात्र संशय:

- ब्रह्मा वैवरत पुराण, कृष्ण जन्म खंड - 13/111

 

भावार्थ :- जब भी कोई श्री राधा नाम लेता है, रोग, शोक, मृत्यु एवं यमराज राधा नाम से भयभीत होते हैं |

 

राधे नाम लेने वाला गोविंद राधे ।

सब को नचाने वाले हरि को नचा दे ।। 

~ राधा गोविन्द गीत (6728)

 

भावार्थ :- जो जन राधे नाम जपता है वह सब को नचाने वाले श्री हरि को भी अपने इशारे पर नचा सकता है

 

गीत्वा तु मम नामिनि विचरेन्मम संनिधौ 

इति ब्रवीमि ते सत्यं क्रीतोऽहं तस्य चार्जुन

 

भावार्थ : आदि पुराणों में वर्णित है हे अर्जुन ! जो मेरे निकट मेरे श्री विग्रह के पास बैठकर मेरे नामो का संकीर्तन करता है में सत्य कहता हूं वह मुझे खरीद लेता है

 

धर्मः सता हितः पुंसां धर्मश्चैवाश्रयः सताम् ।

 

धर्माल्लोकास्त्रयस्तात प्रवृत्ताः सचराचराः ॥

 

भावार्थ :- धर्म ही सत्पुरुषों का हित है, धर्म ही सत्पुरुषों का आश्रय है और चराचर तीनों लोक धर्म से ही चलते हैं

 

रामेति नाम यच्छ्रोत्रे विश्रम्भादागतं यदि। करोति पापसंदाहं तूलं वहिकणो यवा ॥

 

- पद्मपुराण, पाताल खण्ड

 

भावार्थ :- जिसके कानों में 'राम' यह नाम अकस्मात् भी पड़ जाता है, उसके पापों वह वैसे ही को जला देता है, जैसे अग्नि की चिंगारी रुई को।

 

राधाकृष्‍णेति हे गोप ये जपन्ति पुन: पुन: ।

चतुष्‍पदार्थं किं तेषां साक्षात् कृष्‍णोअपि लभ्‍यते ।।

 

- गर्ग संहिता, गोलोक खंड (15.71)

 

भावार्थ :- जो मनुष्य श्री “राधा कृष्णा” यह बारम्बार रटता है उन को चारों पदार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का क्या कहना साक्षात श्री कृष्णा चंद्र भगवान ही मिल जाते हैं ।

 

मन तौ चंचल सबनि तें, कीजै कौन उपाइ ।

साधन कौ हरि भजन है, 

 

भावार्थ :- मन अत्याधिक चंचल है । इसकी चंचलता के निवारण का कोई अन्य उपाय नहीं है । इसके लिए हरि का भजन ही एक मात्र साधन है

 

माधुर्ये मधुरा राधा महत्त्वे राधिका गुरुः ।

सौन्दर्ये सुन्दरी राधा राधैवाराध्यते मया ॥

 

-  उदम्बर संहिता

 

भावार्थ :- श्री कृष्ण कहते हैं कि मैं उन श्री राधा की आराधना करता हूँ जो मधुरता में मधुर, महत्ता में गुरु और सुन्दरता में सुन्दर हैं

 

क्या आप जानते हैं कि हमारी प्यारी राधा रानी  का स्वभाव कैसा है ?

 

सहज सुभाव परयौ नवल किशोरी जू कौ,

मृदुता, दयालुता, कृपालुता की रासि हैं ।

नैकहूं न रिस कहूं भूले हू न होत सखि,

रहत प्रसन्न सदा हियेमुख हासि हैं ।

ऐसी सुकुमारी प्‍यारे लाल जू की प्रान प्‍यारी,

धन्‍य, धन्‍य, धन्‍य तेई जिनके उपासिहैं

 

भावार्थ :- हमारी किशोरीजी का स्वभाव अत्यंत ही सरल और मधुर है और कभी भी इनको क्रोध नहीं आता और निरंतर इनके चेहरे पर मृदु मुस्कान रहती है। यह मृदुता, कृपालुता और दयालुता की साक्षात मूर्ति एवं राशि हैं। यह प्यारे श्री कृष्ण की प्राण से भी अधिक प्यारी हैं और राधा रानी के उपासक धन्य, धन्य, धन्य हैं

 

त्रैलोक्यपावनीं राधां सन्तो सेवन्त नित्यशः ।

यत्पादपद्मे  भक्त्यार्घ्य्म नित्यं कृष्णो ददाति च ।।

 

- नारद पंचरात्र (2.6.11)

 

भावार्थ :- संत जन श्री राधा की नित्य भक्ति करते हैं जो तीनों लोकों के जीवों का उद्धार करती हैं । श्री कृष्ण भी हर क्षण श्रीराधा के चरण कमलों में भक्ति के साथ अर्चना करते हैं।

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