Guys अपने solar ellipse यानी सूर्य गर्हन के बारे में तो जरूर सुना होगा जिसमे सुर्य और पृथ्वी के बीच में चांद आ जाता है इसमें लोगो का मानना होता है की इस समय खाना नही खाना चाहिए और सूर्य गरहन के बाद नहाना चाहिए लेकिन guys साइंटिफिक रूप से देखा जाए तो ऐसा कुछ नही है यह बस लोगो का अंधविश्वास है ।विश्वास और अंधविश्वास के मध्य एक हल्की सी लकीर होती हैं. हम कब उस लकीर को पार कर अंधविश्वास की अँधेरी राह पर बढ़ जाते हैं, इसका आभास नहीं होता. यह अंधविश्वास व्यक्ति को उकसाता है कि वह अपनी सोच के दायरे को इतना संकीर्ण लेकिन मजबूत कर ले कि उसके आसपास का हर व्यक्ति जकड़ जाए.
नवरात्रा के दसवें दिन राजस्थान के प्रतापगढ़ में जो कुछ परम्परा के नाम पर घटित हुआ वह विचलित करने वाला हैं. नेजा जुलुस के दौरान बच्चों को लेटा कर उनके ऊपर एड़ी रखकर आगे बढ़ता भोपा दरअसल हमारे अंधविश्वास का प्रतीक हैं. जिसकों भरोसे में तब्दील करने की कोशिश की जाती हैं.
यहाँ यह मान्यता है कि भोपों के ऐसे कृत्यों से बच्चों की बीमारियाँ ठीक हो जाती हैं. अहम सवाल यह है कि आखिर ये अंधश्रद्धा कहाँ से प्रकट होती हैं. दरअसल यह सब उस प्रक्रिया की पुनरावृत्ति की परिणिति होती है, जो किसी समूह या समाज में होने पर एक जैसा परिणाम देता दिखता हैं.
हालांकि ये मान्यताएं सदैव तर्कविहीन होती हो, ऐसा भी नहीं हैं. परन्तु बच्चों के ऊपर चलकर जाने से वे जीवन भर अस्वस्थ नहीं होंगे, यह मान्यता नहीं है अपितु यह एक ऐसी सत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया हैं जहाँ कोई व्यक्ति स्वयं सर्वशक्तिमान बन बैठता है और निर्धन, असहाय एवं निरक्षर व्यक्तियों के समूह के मस्तिष्क में अपनी बात बिठा देता हैं. जिससे वह ईश्वर के समकक्ष हो जाता हैं.
इस तरह के भोपों का जाल पुरे भारत में फैला हुआ है और वे अधिकतर समाज के कमजोर वर्ग को अपना शिकार बनाते हैं परम्परा के नाम पर बच्चों को सहजता से इसलिए शिकार बनाया जाता हैं क्योंकि वे अपना दर्द बयान नहीं कर सकते. बीमारी से बचने के लिए भोपों का सहारा लेने की इस कुप्रथा के लिए चिकित्सकों की कमी ज्यादा जिम्मेदार हैं. आम लोगों तक सस्ती चिकित्सा पहुंचेगी तब जाकर ही भोपों का मायाजाल टूटेगा.
समस्या केवल यह नहीं है, समस्या की वास्तविक जड़ तो यह है कि विज्ञान की ओर कदम दर कदम बढ़ाता समाज जब इन घटनाओं से दो चार होता है तो उसका विरोध क्यों नहीं करता. यहाँ तक कि शिक्षित समाज और नगरों में भी ऐसे अंधविश्वास की जड़े खूब फलती फूलती नजर आती हैं.
अपने दावे को सिद्ध करने के लिए भोपा कहानियों का ऐसा मायाजाल बुनते है कि हर कोई उस अंधविश्वास पर विश्वास करने लगता हैं. और कब वह विश्वास मान्यता बन जाती हैं पता ही नहीं चलता. ऐसा नहीं है कि प्रतापगढ़ के नेजा जुलुस को शिक्षित समाज पिछले अनेक वर्षों से नहीं देखता आया होगा, परन्तु क्यों किसी ने इसके विरुद्ध आवाज नहीं उठाई.
अलबत्ता आम लोगों के लिए यह परम्परा से अधिक उस विश्वास की बात है जिस पर प्रश्नचिह्न खड़ा करना यानि स्वयं को नास्तिक करार देना हैं. आम लोगों को सस्ती चिकित्सा पहुंचे तब जाकर ही हमारा समाज इस तरह के अंधविश्वासों से मुक्ति पा सकेगा. इसमें समय लगे पर इसकी शुरुआत ही अंधविश्वास पर कुठाराघात की प्रथम पहल होगी.
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