WHAT IS NIBHAND ?

निबंध

 
 

निबंध साहित्य की सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं सशक्त विधा है। किसी एक विषय पर विचारों को क्रमबद्ध कर सुंदर, सुगठित और सुबोध भाषा में लिखी रचना को निबंध कहते हैं। निबंध शब्द की व्युत्पत्ति एवं अर्थ - नि + बन्ध । नि का अर्थ है भली-भांति या विशेष प्रकाश से , बन्ध का अर्थ बांधना। अर्थात निबंध ऐसी रचना है जिसमें विचार विशिष्ट दृष्टि से प्रस्तुत किए जाते हैं। इसके लेखक किसी भी विषय पर खुलकर विचारों की अभिव्यक्ति के लिए पूर्णतः स्वतंत्र होता है। इसमें लेखक सीमित आकार में किसी विषय की सर्वाधिक, स्वच्छंद एवं सुव्यवस्थित व्याख्या करता है।
मानतेन- निबंध विचारों, कथाओं और उदाहरणों का मिश्रण है।
निबंध का विकास और उद्धव
हिंदी निबंध का जन्म भारतेंदु काल में हुआ। नवजागरण का समय था। हिंदी निबंध के विकास को 4 कालों में विभक्त किया जा सकता है-
 
1 भारतेंदु युग (1868 ई 1900 ई)
2 द्विवेदी युग ( 1900 ई - 1920 ई)
3 शुक्ल युग (1920ई- 1940 ई)
4 शुक्लोत्तर युग (1940 ईके उपरांत)
 
भारतेंदु युग- हिंदी निबंध की विकास यात्रा का प्रारंभिक चरण। हिंदी निबंध के जन्मदाता भारतेंदु हरिश्चंद्र को तथा बालकृष्ण भट्ट को माना जाता है। 1872 ई. में ‘नाटक’ निबंध भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखी गई।
भारतीयों के दिन-दुखी दशा के ओर लेखकों का बहुत ध्यान था ।पुराने गौरव, मान ,ज्ञान ,बल- वैभव को फिर लाने का प्रयत्न हो रहा था। लेखक अपनी भाषा को भी हर प्रकार में संपन्न और उन्नत करने में लगे हुए थे और सबसे बड़ी बात यह है कि इस काल के लिए कल स्वतंत्र विचारों के थे।
उस युग में भारतेंदु हरिश्चंद्र , बालकृष्ण भट्ट, प्रताप नारायण मिश्र , बद्रीनारायण चौधरी बालमुकुंद गुप्त राधाचरण गोस्वामी जैसे प्रमुख निबंधकार हुए।
भारतेंदु जी के निबंध भी अनेक विषय पर है कश्मीर कुसुम , कालचक्र , बादशाह दर्पण , वैद्यनाथ धाम , हरिद्वार सरयू पार की यात्रा , नाटक ,भारतवर्ष इत्यादि। भारतेंदु सबसे अधिक सफल हुए अपने व्यंग्यात्मक निबंधों में। इनके निबंधों की भाषा स्वच्छ और शलेषपूर्ण है।
बालकृष्ण भट्ट अपने समय के सर्वश्रेष्ठ निबंधकार माने जाते हैं। भट्ट जीभट्ट जी ने सभी प्रकार के निबंध लिखें। मेला-ठेला ,वकील- वर्णनात्मक ,सहानुभूति , कल्पना शक्ति, खटका , आत्मनिर्भरता इत्यादि।
जन साहित्य को जन भाषा में लिखने वालों में प्रताप नारायण मिश्र का नाम सर्वप्रथम आता है। छोटे-छोटे विषयों पर इतने बढ़िया मनोरंजन और उच्च उद्देश्य को लेकर किसी लेखक ने नहीं लिखा नाक , भौंह , वृद्ध ,दांत ,पेट , मूंछ आदि विषय को लेकर अपने निबंधों में मनोरंजन का सामान भी जुटाया और देश प्रेम समाज सुधार हिंदी के प्रति प्रेम स्वाभिमान आत्म गौरव का संदेश भी दिया।
 
दिवेदी युग
दिवेदी युग का नाम आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर रखा गया है। अपने युग के यह अचार्य थे आचार्य काम होता है शिक्षा देना, ज्ञान देना, समाज पर नया संस्कार डालना और सुधार करना यह सब काम इन्होंने किए इसलिए वह आचार्य कहलाए और उनके नाम पर ही इस काल का नाम रखा गया।
अपने निबंधों और समालोचनाओं के द्वारा सबसे मुख्य काम इन्होंने भाषा सुधार का किया। द्विवेदी जी ने सभी प्रकार के निबंध लिखें कवि और कविता, प्रतिभा ,साहित्य की महत्ता उनके विचारात्मक निबंध है लोभ, क्रोध, संतोष भावात्मक इत्यादि।
महावीर प्रसाद द्विवेदी ,माधव प्रसाद मिश्र ,अध्यापक पूर्ण सिंह और चंद्रधर शर्मा गुलेरी इस युग के प्रमुख निबंधकार है गोविंद नारायण मिश्र, पद्मासिंह शर्मा और श्यामसुंदर दास का नाम दूसरी श्रेणी में लिया जा सकता है।
 
माधव प्रसाद मिश्र भारतीय संस्कृति धाम दर्शन साहित्य कला के उपासक इनका अपना व्यक्तित्व था यदि यह किसी को भारतीय और प्राचीन साहित्य का गौरव कटाने का प्रयत्न करते हुए पाते थे तो उनके आलोचना करते थे।
अध्यापक पूर्ण सिंह इस युग के सबसे प्रमुख भावुक और विचारक निबंधकार हैं।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी भी स्वतंत्र विचारों के लिए प्रसिद्ध है।
 
शुक्ल युग
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के नाम पर इस युग का नाम रखा गया है। हिंदी निबंध के विकास की गति में तीसरे मोड़ का श्रेय रामचन्द्र शुक्ल के निबंधों के संग्रह चिंतामणि को है। इसने पाठकों के समक्ष नवीन विचार, नव अनुभूति एवं नई शैली उपस्थित की। इस युग के निबंधकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, गुलाब राय, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रा नन्दन पंत, पं. सूर्य कांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा I
 
शुक्लोत्तर युग
शुक्ल परवर्ती निबंधकारों में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी, जैनेंद्र, डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल, डॉ. सत्येंद्र, शांति प्रिय द्विवेदी, डॉ. विनय मोहन शर्मा, डॉ. रामरतन भटनागर, डॉ. राम विलास शर्मा, डॉ. विश्वंभर ‘मानव’, प्रभाकर माचवे, डॉ. पद्म सिंह शर्मा ‘कमलेश’, इलाचन्द्र जोशी,
निबंध के अंग :
. शीर्षक :
शीर्षक आकर्षक होना चाहिए ताकि लोगों में निबंध पढ़ने की उत्सुकता पैदा हो जाए।
2. प्रस्तावना :
निबंध की श्रेष्ठता की यह नींव होती है। इसे भूमिका भी कहा जाता है। यह अत्यंत रोचक और आकर्षक होनी चाहिए परन्तु यह बहुत लम्बी नहीं होनीचाहिए। भूमिका इस प्रकार की हो जो विषयवस्तु की झलक प्रस्तुत कर सकें।
3. विस्तार :
यहीं विचारों का विकास होता है। यह निबंध का सर्वप्रमुख अंश है। इनका संतुलित होना अत्यंत आवश्यक है। यहीं निबंधकार अपना दृष्टिकोण प्रकट करता है।
4. उपसंहार :
निबंध का समापन एक निश्चित क्रम में होता है। लेखक अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। उपदेश, दूसरे के विचारों को उद्घृत कर या कविता की पंक्तिके माध्यम से निबंध समाप्त किया जा सकता है।
निबंध के प्रकार :
आमतौर पर निबंध के चार प्रकार
(essay example)
होते है, जो इस प्रकार है...
1. वर्णनात्मक निबंध :
यह उस निबंध को कहते हैं जिसमें किसी घटना, वस्तुअथवा स्थान का वर्णन होता है। वर्णन के लिए भाषा सरल और ओजस्वी होनी चाहिए और शैली रोचक। निबंध पढ़कर उस वस्तु घटना या स्थान का पूरा चित्र आँखों के सामने आ जाना चाहिए।
किसी त्यौहार जैसे-होली, दीपावली, ईद या क्रिसमस, यात्रा, दृश्य,स्थान या घटना, गणतंत्र दिवस की परेड, ताजमहल, ओलपिक खेल आदि पर लिखे गए निबंध प्राय: वर्णनात्मक निबंध कहलाते है।
2. विचारात्मक निबंध :
विचार या चिंतन की प्रधानता होने के कारण इन्हें विचारात्मक निबंध कहते हैं। इस प्रकार के निबंध लिखना प्राय: कठिन होता है, भूदान-यज्ञ,अहिंसा परमो धर्म:, अछतोद्धार विधवा-विवाह जैसे सामजिक राष्ट्रीय एकता, विश्व बंधुत्व जैसे - राजनीतिक तथा ईश्वर, आत्मा जैसे दार्शनिक विषय आते है।
3. भावात्मक निबंध :
इसमें कल्पनात्मकनिबंध भी आते हैं। कल्पनात्मक निबंध के उदाहरण है- ‘यदि मैं प्रधानमंत्री होता’ मेरी अभिलाषा, ‘नदी की आत्मकथा’ आदि।
4. साहित्यिक या आलोनात्मक निबंध :
किसी साहित्यकार, साहित्यिकविधा या साहित्यिक प्रवृत्ति पर लिखा गया निबंध साहित्यिक या आलोचनात्मक निबंध कहलाता है, जैसे मुंशी प्रेमचंद, तुलसीदास, आधुनिक हिन्दी कविता, छायावाद हिन्दी साहित्य का स्वर्णयुग आदि। इसमें ललित निबंध भी आते हैं। इनकी भाषा काव्यात्मक और रसात्मक होती है। ऐसे निबंध शोध पत्र के रूप में अधिक लिखे जाते हैं।
हिंदी निबंध साहित्य ने थोड़े से समय में ही पर्याप्त उन्नति कर ली है। भारतेन्दु युग से आज तक निबंध साहित्य प्रौढ़तर होता जा रहा है। कुछ निबंधकार पाश्चात्य निबंधकारों से प्रभावित होकर हिंदी साहित्य में भाषा एवं सौंदर्य की विहीनता का प्रतिपादन करते हैं। निबंध में अनुभूति मुख्य तत्व है। वर्तमानकाल में निबंध में अनुभूति शून्यता आती जा रही है। निबंधकार साहित्यिक समस्याओं तक अपने को संकुचित करता जा रहा है। अन्य परिवेशों को अपने निबंध का विषय बनाने में अपने को असफल पाता जा रहा है।

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