हम यही सोच रहे थे कि वाली और थाली बजाने के साथ हमारे लिए खाना से तो कितना अच्छा होता! हम भी खुश होकर ताली बजा रहे थे। यही सोचकर कि आज हम दिन भर चैन की नींद सो सके, वरना क्या रोज दिन-रात चीख दिल्ल वाहनों की कनफट आवाज से चैन से सो नहीं पाते। ताली और थाली बजाने का समर्थन सत्ताधारियों के साथ-साथ विपक्षियों ने भी किया। दूसरे दिन सभी समाचार पत्रों में अपने फोटो देखने की होड़ में थे, वॉट्सएप पर सबकी वही डीपी थी। उसके तुरंत दो दिन बाद इक्कीस दिनों के लिए कर्फ्यू लागू कर दिया। 22 मार्च की तो जनता द्वारा जनता के हित के लिए लगाया गया जनता कर्फ्यू ठीक ही था, पर इस दिनों का लॉकडाउन हमारे लिए चिंता का विषय था। रात में अचानक जादू हो गया था, सारे रास्ते सूने नजर आ रहे थे। शरीर में धमनियों की तरह बिछा रेलवे जाल सुना देखकर ऐसा लग रहा था मानो देश की गतिविधियाँ थम गई हैं। प्रधानमंत्री के साथ-साथ राज्यों के मुख्यमंत्री, जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त, फिल्म स्टार मीडिया द्वारा घर में ही रुकने का संदेश दे रहे थे। मुझ जैसे कई मजदूरों की चिंता थी कि हमारे घर ही नहीं तो हम कहाँ रुके। इतना ही नहीं हम सभी रुक जाएंगे तो गाँव में माँ-बाप, बीवी-बच्चे क्या करेंगे, उन्हें कोई काम भी नहीं देता। क्या खाएंगे वाला प्रश्न हमारे सामने था। बसें, ट्रेन और व्यापारिक व्यवस्थाएँ बंद होने के कारण हम दो-तीन दिन रुक तो गए थे, पर हम ठहरे प्रवासी मजदूर, लॉकडाउन के कारण रोजगार ही नहीं तो नगर में रुककर क्या करते। बस, सब की चर्चा का एक ही विषय था गाँव की ओर चले। "बस ही नहीं जी, ऐसे कैसे जाता बताव हमला।"
"बस नहीं कतो रेलवे से जायेंगे।" "रेलवे बी नहीं कतो क्या करना जी ?"
"कितनी बार बोल्या था गाँव में च रहकू ए करेंगे, सुनते कहाँ मेरी बातां ?"
"ये चुप रह, लई शहाण्या हुए, मुझेच शहाणपण सिखाने कु आए। "
"ये आई, भूख लगी, खाना दे ना।" इन आवाजों के साथ रोते बच्चे, नवजात शिशु को देखते ही हृदय फट जाता और चर्चा होती कि जो भी हो गाँव की ओर जाना है। सब मिलकर लिया गया निर्णय हम सब ने स्वीकार किया और हम सब खुश
हो गए कि चार-आठ दिन चलते हुए गाँव पहुंचेंगे। सबके साथ मैं भी चला था मुंबई से गाँव की ओर। साथ में जगदेवी और मुन्ना भी थे। कुदाल, फावड़ा और टोकरी तो मुंबई में ही सेठ के पास रखकर निकले थे। बस तो नहीं थी, सड़क मार्ग से जाने पर पकड़े जाने का भय, सोचा कि ट्रेन की पटरी से चलते जाएंगे। हम तीनों के साथ और भी कई लोग थे, जो अपने-अपने गाँव लौट रहे थे। सभी मजदूर तो नहीं थे, कई नौजवान युवक पढ़े-लिखे थे। उनमें कोई हाल ही में डिग्री पास होकर नौकरी करने आया था। कोई इंजीनियर के पास सुपरवाइजर था, तो कोई बड़े-बड़े मॉल में काम करता, कोई शोरूम में, कोई होटल में काम करता, कोई रास्ते पर हर एक माल बेचता। कोई रास्ते पर बैठकर बूट पॉलिश करता। मैं सोच रहा था.. शायद मुंबई शहर हम ही तो चला रहे हैं। हम गाँव वाले न होते तो यह महानगर कैसे चलता, कौन सब्जी बेचेगा, कौन बूट पॉलिश करेगा, सेंटरिंग और प्लंबर काम कौन करेगा और कौन दूसरों के घर बर्तन मांजने और रसोई बनाने जाएंगी। .पर मेमसाब ने तीन दिन पहले ही घरवाली को काम पर आने से मना किया था। कहा भी था, "जगदेवी, कल से महीना भर के लिए छुट्टी लेना और महीने के बाद हमारे फोन करने पर ही आना। और देख ले मेरा दिया हुआ मोबाइल भी इधर ही रखना जाते समय...।" यह भी कह रही थी मेमसाब, "पता नहीं कितने घरों में और कहाँ-कहाँ काम करती है। कहीं कोरोना संक्रमित घर से यहाँ आ जाए तो सब सत्यानाश कर देगी। मेमसाब के कहने पर साहब ने मेमसाब पर चिल्लाया भी था। घर उनका है, हम मजदूरों का क्या, तू नहीं तो और सही पर हुआ कुछ और ही घरवाली दिन भर दस-बारह घरों में बर्तन मांजने और कपड़े धोने का काम करती थी। पर बहुतेरों के मन में संदेह होने से काम से निकाल दिया। दो-तीन घर ही बचे हुए थे। चार ही दिनों में पूरी मुंबा नगरी शांत, रास्ते पर कोई घूमता नजर नहीं आता। अगर कोई घूमता तो खैर नहीं था। रात में झोपड़ी के बाहर बैठकर हम चर्चा करते, "घर में बैठे-बैठे बदन दर्द हो रहा है यार। काम होता तो जरूर जाते। अब क्या करें ?"
पड़ोसी झोंपड़ी से ही बोल रहा था, "अरे बदन दर्द हो रहा हो तो सुबह रास्ते पर जाना, मॉलिश और मसाज करेंगे... वह भी मुफ्त में... बिल्कुल फुकट...।" हम झोंपड़ी के बाहर ही बैठकर हँस रहे थे। पुलिस द्वारा मारने की बात कह रहा था। वह । सम्पन्न लोग भी ऐसे थे, घर में सब कुछ होने पर भी गोडाउन की तरह भरते, महीना-दो महीने का स्टॉक करने की बात उन्हें सूझती। हमारा क्या कहाँ रखे सेपहले कैसे लाए, उतना पैसा ही कहीं है। बुधवार को ही पगार मिलता था, पर बुधवार से ही लॉकडाउन किया गया था। हाँ...दो-तीन दिन यूं ही बिताए... राशन लाने के लिए भी पैसा नहीं था। घर के नाम से तो मुंबई में कुछ है ही नहीं, पटरी के बाजू में ही झोंपड़ी में गुजारा करते, उसमें रुपये के नाम पर फूटी कौड़ी भी नहीं। सुबह की चिंता थी। मैंने ठेकेदार मुकेश को फोन किया, "मालिक, क्या यह सच है. कि कल से काम को छुट्टी दी गई है।"
"हाँ... हाँ सच है।"" " पर मालिक, कल पगार का दिन है और गुडीपडवा भी है। कुछ भी पास में
नहीं...
"प्रास में नहीं तो हम क्या करें, कहीं से जुगाड़ कर ले। मुकेश ने कहा था। वैसे चार दिन पहले ही मोटरसाइकिल पर जाकर मैंने ठेकेदार के घर किराना माल की वार-पाँच थैलियाँ रखी थीं। मुझे पक्का याद है उसमें काजू, बादाम के साथ-साथ स्त्रो पाउडर आदि भी... और हम मजदूरों से कहता है जुगाड़ कर लो। वैसे ठेकेदार मुकेश काम कुछ भी करता नहीं। कंस्ट्रक्शन से काम कॉन्ट्रैक्ट लेता और हम मजदूरों से काम करवा लेता है। हमें रोजाना पाँच सौ देता है और उधर भालिक से स्क्वेयर फीट के हिसाब से वसूल करता है। यह कहाँ का न्याय है। पर क्या करें, आज मुझे बचपन याद आता है। बाप पढ़ाई के लिए कहता, नहीं करता तो मारता, कभी रोते हुए पढ़ाई करने के लिए कहता। कहता कि पढ़-लिखकर बड़े बन जाओगे तो मुंबई में इंजीनियर या डॉक्टर बनकर जिंदगी भर चैन से रहोगे बाप की मानी नहीं, इसलिए आज उसी मुंबई में मजदूरी करनी पड़ रही है।... मैं भी चाह रहा था कि मुंबई में ही क्यों न हो मुन्ने को पढ़ाऊँ... और एक दिन वह हमारा इंजीनियर बन जाए और मैं तथा जगदेवी उसके हाथ में काम करें... पर क्या ट्रेन की पटरी से चलते हुए गाँव की ओर जाना पड़ रहा है।... कारण था पत्नी और मुझे... हम दोनों को काम से छुट्टी मिली थी।
ट्रेन बंद होने पर भी माल गाड़ी चलती, हम में से कई मजदूर माल गाड़ी से चले गए और अगले स्टेशन पर पकड़े भी गए। वाह। कैसा चमत्कार है, आश्चर्य की बात है, विदेश में बसे भारतीय नागरिकों को सम्मान के साथ हवाई जहाज से भारत ले आया गया था। वे तो भारत में पढ़-लिखकर पैसे कमाने के लिए, अमीर बनने के लिए परदेस गए थे और हम तो पापी पेट भरने के लिए गाँव से चार पाँच सौ किलोमीटर दूर मुंबई आए थे। अब राष्ट्रभक्ति हमारी कि उनकी जो भारत सरकार के पैसे से साक्षर हो गए थे और मातृ ऋण, पितृ ऋण चुकाने के बदले धन कमाने के लिए अमेरिका, इंग्लैंड, अरब प्रदेशों के साथ इटली आदि देशों में गए थे। हवाई अड्डे पर उतरते ही उनकी जाँच, देखभाल, भोजन आदि की व्यवस्था और इधर हमें चार-पाँच सौ किलोमीटर अपने खर्चे से भी जाने की अनुमति नहीं। गुस्सा आता मुझे। "पता नहीं हमने क्या पाप किया है, हमारी इतनी भी व्यवस्था नहीं" जगदेवी के कहने पर दसवीं उत्तीर्ण कोई हमसफर कह रहा था, "काकू उनका वह मानवीय अधिकार है... सरकार की जिम्मेदारी है इसलिए उन्हें विदेश से भारत वापस लाना ही पड़ता है। यह सरकार की जिम्मेदारी है।"
"वाह रे मानवीय अधिकार... हम तो मानव ही नहीं!" मुझे कभी-कभी दोनों की बातें सच लगतीं। आखिर मैंने ही घरवाली को शांत रहने के लिए कहा। जो भी हो हमारी पटरी की पैदल यात्रा जारी थी कि अचानक पीछे से जोर से सीटी बजी, घबराए हुए हम सब ने देखा तो माल गाड़ी आ रही थी... शायद राशन लेकर जा रही होगी। राशन कहते ही जेल में धकेले गए वे मजदूर याद आए, जो राशन लाने तो जा रहे थे, परंतु आईडी के अभाव में पकड़े गए... रास्ते पर आने के कारण। पेट की भूख उन्हें चिल्लाने के लिए मजबूर कर रही थी।...एक दो नहीं लगभग सत्तर-अस्सी लोग तो थे, बाकी और महानगरों की बात ही अलग थी। मोबाइल में ही टीवी देखते हुए हमसफर युवकों से पता चला था कि कोई दूध के टैंकर में बैठे जा रहे हैं, उन्हें पकड़ा गया है, कोई रास्ते से चलते गए और पकड़े गए। उन्हें कई गाँव में स्कूलों और अस्पतालों में भर्ती कर दिया जा रहा था, सबको अलग-अलग कमरे में डेढ़ दो मीटर की दूरी पर रखा जा रहा था यह भी सुनने में आ रहा था हमें कि डॉक्टरों ने अपना अस्पताल भी बंद किया है, नौकरी से इस्तीफा दे दिया है। दूसरी ओर जान जोखिम में डालकर कई डॉक्टर कोरोना संक्रमित मरीजों की सेवा कर रहे हैं।... युवक आपस में बातचीत करते उनके कहने से मालूम हो गया था कि कोरोना एक वैश्विक महामारी है। मैंने बचपन में प्लेग का नाम सुना था मेरे दादा जी कहते कि अंत्येष्टि में जाने के लिए भी लोग बरते थे। कहते कि स्मशान भूमि पहुँचाने से पहले ही दूसरा कोई मर जाता उस परिवार में महामारी क्या होती है अब पता चला था।
हमें हँसी तब आती जब कोई घंटा गाड़ी आती। बार-बार एक ही संदेश होता कि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से आए हो तो तुरंत डॉक्टरों से या प्रशासन से संपर्क करें। बार-बार हाथ धोने और वह भी साबुन से सुनते ही पत्नी हँसती, यहाँ दिन में एक बार नहाने के लिए साबुन मिलना मुश्किल तो दिन में बार-बार हाथ कौन धोता.... हवाई अड्डा कहते ही हँसी इसलिए आती कि सिर पर ईंटें हो-ढोकर बाल झड़ने से 'हवाई अड्डा' नाम से परिचित पड़ोसी रामू की याद आती, जो मजदूरी करते-करते लू लगने से चल बसा था बड़ा अच्छा था, गाँव से मुंबई आया था। पहले दो-तीन वर्ष अकेला ही था, बीवी बच्चे गाँव में थे। बच्चे बड़े बनते ही, यानी पंद्रह-सोलह साल के ही, सब को मुंबई ले आया था। गाँव में थोड़ी जमीन थी। मुंबई में सभी मजदूरी करते, औरतें भी ईटें उठाने जाती थीं, बच्चे भी पहले मजदूरी करते, बाद में सेंटरिंग का काम करते साल में सात महीने मुंबई में रहता और तीन-चार महीने गाँव में खेती करता। सब ठीक चल रहा था, पार साल ही मई महीने में कड़ी धूप में काम करते-करते लू लगी। और बच्चों को संभालने का वचन लेते हुए पत्नी की और देखते-देखते दम तोड़ दिया, अच्छा हुआ बेचारे की पत्नी सभी बच्चों को लेकर गाँव चली गई थी। अचानक रामू याद आया था। हंसने का समय तो नहीं था, परंतु हवाई अड्डे का नाम सुनते ही झोपड़पट्टी में चर्चा होती ... पीछे से आई मालगाड़ तो चली गई, रामू की याद आते ही मैं डर गया था इसलिए कि मरने से कुछ ही दिन पहले रामू ने कहा था, "पता नहीं, भविष्य में क्या-क्या होगा। कभी सुनामी, कभी अकाल तो कभी बाढ़ ने हमारा जीना हराम किया है। वास्तव में जिम्मेदार है अपने आप को सभ्य तथा सुशिक्षित मानने वाला वह समाज जिसे किसी से लेना देना नहीं है। उनके एसी कूलर, चार पहिए वाली गाड़ियाँ, जिससे तापमान बढ़ता जा रहा है। आदमी है क्या, आदमी होकर भी जानवरों के साथ-साथ खरगोश, बिल्ली, सूअर, गो माता तथा सांपों को भी मारकर खा रहा है। आने वाला समय ही जरूर सबक सिखाएगा, जिसका परिणाम दुनिया को भुगतना होगा।" पहले ही रामू याद आता तो रेल पटरी से नहीं हटता क्या करें जैसे विचार मन में आते पर मुन्ना को देखकर जीने की इच्छा होती। साथ में है क्या सिर पर बोरे में बिस्तर, छोटे डिब्बे और अचार से भरी डिबिया तथा पोटली में आठ-दस बासी रोटियाँ और तीन वर्ष का प्यारा मुन्ना ! उसे ही देखने की इच्छा होती.
"मुन्ना... मुन्ना कहाँ है मेरा मुन्ना ? कहाँ रखा है उसे, माय-बाप बोलो ना मुन्ना कहाँ है, मुन्ना ! मुझे बताओ... दिखाओ कहाँ है?" मैं चिल्ला रहा था उस विद्यालय में जहाँ सभी को अलग-अलग कमरे में रखा गया था।... पता नहीं कैसे पता चला कि अगले रेलवे स्टेशन के पहले ही पुलिस का जत्था आया। हम में भगदड़ मच गई, कोई पीछे भागते रहें पर गुलिस ने माइक पर घोषणा की कि सरेंडर हो जाए। हमारी भलाई के लिए बार-बार रेलवे पुलिस द्वारा घोषणा की जा रही थी। कई पीछे भागे जा रहे थे पर पुलिस द्वारा की जाने वाली कार्रवाई के भय से पटरी से छलांग लगाए, नीचे पचास फीट खाई में पुलिस वाले तो हमारी रक्षा के लिए प्रयास कर रहे थे पर हममें से ही एक ने पटरी से पत्थर उठाया और फेंक दिया। देखते-ही- देखते पथराव शुरू हुआ था, बस घायल पुलिस ने डंडा थाम लिया। जो सीधे चले गए उनके पास वे बच गए, पर न मानने वालों के साथ दूसरों की धरपकड़ में डंडे बरसाना शुरू किया था। दोनों ओर से हाथापाई में मुझे इतना ही पता है कि मेरे पास मुन्ना था और जगदीश के सिर पर थैली थी, जिसमें अचार की डिबिया और पोटली बासी रोटियाँ थोड़ी देर पहले भूखे मुन्ने को अधार लगाई रोटी दी थी। बाकी कुछ पता नहीं था हमें किसी जंक्शन स्टेशन पर पकड़े गए सभी की बकरी की तरह भर दिया गया था। तीन-चार जालीदार वैन में सभी ठूंस दिए गए और मैदान में बनाए गए शामियाने में ले जाया गया हमें थोड़ी देर बाद सभी के स्वास्थ्य को देखते हुए अलग-अलग वैन में भर दिया गया। जालीदार वैन में बैठे-बैठे हम देख रहे थे. एक दूसरे को पता नहीं कहाँ ले जा रहे थे। रास्ते पर वाहनों की लंबी कतार ! मोटरसाइकिल वालों की पूछताछ की जा रही थी। जिनके पास कार्ड था, पहचान पत्र दिखाते, पर बेवजह घूमने वालों का खैर नहीं था। कार में बैठे यात्रियों की भी पूछताछ होती। सुनने में आया था कि दूसरे राज्य के अपने-अपने गाँव लौट रहे थे, पर वाहनों की सुविधा न होने के कारण ट्रक पर सवार होकर जाते, पर पुलिस खड़ी थी उन्हें उतारने के लिए सब से कहा जा रहा था लॉकडाउन! कहीं शिविरों में भर्ती कर सरकार की ओर से भोजन और निवास की व्यवस्था की जा रही थी। बस, हम मजदूरों के साथ कई युवकों को शहर की ओर ले जा रहे थे। पुलिस की जालीदार वैनों की संख्या बढ़ती गई थी। बाद में पता चला था कि सभी को पुनः मुंबई ले जाया जा रहा है। पर यह हमारी गलतफहमी थी... पिछली जगह हमारे स्वास्थ्य की देखभाल की गई थी, जिसमें कई कोरोना संक्रमित थे। परंतु उनसे दूर रखने के लिए हमें कहीं और ले गए थे। एक-एक दिन कटे नहीं कटता था पर चौदह दिन काटने पड़े। रात भर हॉल में ही दो-दो मीटर की दूरी पर प्रवासी मजदूरों के साथ बेरोजगार युवक थे। जिनके पास मोबाइल थे एक-दो दिन देखते रहे पर तीसरे दिन बैटरी खत्म और मोबाइल भी बंद! अर्थात लॉकडाउन! मैंने कहा था अच्छा हुआ कि मोबाइल बंद हुआ क्योंकि बार-बार दुनिया भर के मृतकों के बढ़ते आंकड़े, हाँ, चीन ने काबू तो पा लिया है पर लोग कहते हैं कि चीन की कुटिलता दुनिया समझ रही है। अमेरिका, इटली इंग्लैंड जैसे देशों की परिस्थिति बिगड़ती जा रही थी। यदि विकसित देशों की अवस्था, वहाँ की चरमराती अर्थव्यवस्था का विचार किया जाए तो विकासशील भारत का भविष्य क्या होगा इसकी चिंता अर्थ तज्ञ करते, भारत में इंग्लैंड और अमेरिका जैसी प्रगत चिकित्सा सुविधा भी नहीं है, फिर भी सरकार प्रयत्न कर रही है। केंद्र सरकार और राज्य सरकार भी प्रयास कर रही हैं, देखते- देखते कई दातारों ने डोनेशन देना शुरू किया था। हमें शिविर में इसकी चर्चा सुनने आती। पर बार-बार मेरा एक ही पूछना था कि जगदेवी और मुन्ना कहाँ हैं। बताया गया था कि महिला वार्ड अलग है, मुन्ना उसी के पास है। काटे भी समय नहीं कटता था। न ही हम कहीं घूम सकते थे और न ही कहीं हाथ लगा सकते थे और न ही एक दूसरे को स्पर्श कर सकते थे। "कैसा समय आ गया रे भगवान!" सबका कहना था। दिन भर चर्चा तो क्या करे... कोई कहता मांसाहार करने से ऐसा हो गया है। बर्ड फ्लू, इबोला जैसे वायरस प्राणी के शरीर से होते हुए मानव तक आ गए हैं।
कोरोना भी मांसाहार के कारण ही फैला है। फिर कोई आध्यात्मिक बीच में ही कबीर का दोहा सुनाता-
"बकरी पाती खात है, ताकि काढि खाल। जे जन बकरी खात है, तिनको कौन हवाल: । "
फिर कोई कहता कि हम शाकाहारी हैं। शाकाहारी होने पर भी कोरोना से संक्रमित होने का कारण मात्र नहीं बताता कोई अपने धर्म में मरने पर मुखारिन अर्थात दाह संस्कार और रोजमर्रा के अन्य कर्मों की चर्चा करता। नाक पर पट्टी बाँधने, शाकाहार होने और सूर्यास्त के बाद पानी तक न पीने को लेकर गर्व करता ।..." तुम कमजोर हो, तुममें इम्यूनिटी पावर कम है, इस डर से ऐसा करते हो, वास्तव में यह है कि इम्यूनिटी पावर अधिक होने से वायरस कुछ नहीं करता।" फिर अपने-अपने धर्म के बडप्पन की चर्चा सभी करते। मुझे चिंता थी पत्नी और मुन्ना की लेकिन सब की चर्चा का विषय धर्म था। क्रोधित होकर मैंने कहा था, "धर्म तो एक ही है- मानव धर्म । जहाँ हम पड़ गए हैं यहाँ कोई अन्य धर्म नहीं है। हमें मानव धर्म निभाना है, राष्ट्र धर्म निभाना है। कोरोना कोई धर्म, जाति, भाषा या उच्च-नीच नहीं जानता। उसे इतना ही मालूम है कि जो उसे मिलता है वह उसे ले जाता है... सदा के लिए।" क्रोध मेरा तब शांत हुआ जब टीवी पर दुनिया में मृतकों की बढ़ती संख्या दिखाई जा रही थी ज्यादा नहीं... बस पाँचवीं तक पढ़ाई करने के कारण अक्षर ज्ञान था... टीवी पर दिखाया जा रहा था।
"मुन्ना.. मेरा 1..... मेरी जगदेवी कहाँ....मेरा बेटा कहाँ है... यह दक्षिण मुन्ना... दिशा में कहाँ जा रहे हैं...इनकी दक्षिण दिशा की यात्रा.. नहीं ऐसा नहीं हो सकता... बेटे... " मेरा प्रलाप सुनते ही नर्स आ गई थी... इंजेक्शन लगा ही रही थी कि टीवी पर दिखाया गया कि संक्रमित प्रवासी मजदूरों को प्लास्टिक में लपेटे रखा गया है..... बाजू में ही दूर छोटे बच्चे... उनकी सांस फूलती जा रही है... पता चला कि विशेष अस्पताल में उनकी अलग-अलग देखभाल की जा रही है। टीवी पर कालाबाजारी भी दिखाई जा रही थी, कई व्यापारी पैंतीस वाली शभर पचास रुपये किलो, बीस रुपये वाला प्याज साठ रुपये किलो बेच रहे थे तो कहीं पुलिसों की छापामारी में मास्क और सेनिटाइजर बक्से मिले... बताया जा रहा था कि लगभग पाँच छः लाख रुपये के बक्से हैं... मानवता का गला घोंटने वालों के बनाम अपनी जान की परवाह न करते हुए पुलिस प्रशासन, डॉक्टरों, नर्सों, सफाई कर्मचारी, आशा दीदी, घंटा गाड़ी, सब्जी बेचने वालों तथा सेवाभावी संस्था के प्रतिनिधियों के साथ-साथ ग्राहक के रूप में कालाबाजारी करने वालों की धरपकड़ करने वाले अधिकारी को देखते ही सीना फूल जाता।
दिन काटे नहीं कट रहे थे... देखते-देखते बारह दिन बीत गए थे कि कोई नर्स पूछते हुए आ गई, "यह बालक किसका है... इस के परचित कोई हो तो बताना वरना अगली कार्यवाही के... " में दोपहर की झपकी ले ही रहा था कि देखा और चिल्लाया, "मुन्ना... ओ मेरे मुन्ना।" मुन्ना नर्स की उंगली पकड़ मेरी ओर हँसने हुए आ रहा था। नर्स ने कहा, "अब यह निगेटिव पाया गया है, कोई रिस्क नहीं है। ही इज ओके" उसके चेहरे पर विशेष भास्क था... मैंने पूछ इसकी माँ कहाँ है। उत्तर मिला था, "अभी लॉकडाउन है, कुछ पता नहीं है।" कई दिनों के बाद मैं सिर्फ मुन्ने को ही साथ में लेकर गाँव की ओर चला गया... बहुत कुछ खोकर.... जिंदगी में लिखा गया था 'लॉकडाउन!'
You must be logged in to post a comment.