घरों में 95 प्रतिशत पर्या गीन्ठी की लकड़ी से बने होते हैं। पर्या
बनाने के लिए आम की लकड़ी या फिर तूणी की लकड़ी का भी प्रयोग किया जाता है।
जिस पेड़ का तना मोटा होता है उसे काटकर फिर उसके आतंरिक भाग को खोखलाकिया जाता है और बाहरी भाग पर सुन्दर नक्काशी की जाती है जिससे पर्या दिखने में आकर्षक लगे।
छांछ छोलने में पर्या की सहयोगी होती है "रै" ,
"रै" बनाने के लिए कण्डार(साल) की लकड़ी सबसे उपयुक्त मानी जाती है, ये वही कण्डार है जिसका प्रयोग ब्या शादी में स्वागत गेट बनाने के लिए भी किया जाता है,कण्डार के अलावा भेंवल के पेड़ या और किसी पेड़ की लकड़ी से भी "रै" बनायी जाती है बस शर्त ये होती है कि जिस शाखा से "रै" बनेगी वो सीधी होनी चाहिए।
"रै" ऊपर से नीचे तक बेलनाकार होती है,बेलनाकार भाग के अन्तिम भाग में उंगलीनुमा संरचना होती है जिन्हें घांग
कहते हैं । रै के बेलनाकार भाग के बीचों बीच वलय(रिंग) बनाये जाते हैं, उन वलयों पर रस्सी लगाई जाती
है और उस रस्सी को नैतण कहा जाता है। पर्या कमरे के उस स्थान पर रखा जाता है जहाँ छंछोला बना
रहता है (पहले ये छंछोला मकान निर्माण के समय ही बना दिये जाते थे )।छंछोले दो होते थे एक ऊपर एक
नीचे दोनों में रस्सी होती थी उस रस्सी में "रै" को फंसाया जाता है और "रै " को दधि (दही) से भरे पर्या
के अन्दर डुबाया जाता है ,। अब शुरु होती है छांछ छोलने की क्रिया।
छांछ अधिकतर या तो सुबह ब्रह्ममुहूर्त में या रात को छोली जाती है, आवश्यकता पड़ने पर दिन में भी छोल सकते हैं ।ये छांछ छोलने वाले व्यक्ति की व्यस्तता पर निर्भर करता है। कुछ पुरुष भी छांछ छोलने में निपुण होते हैं पर अक्सर ये कार्य घर की स्त्रियाँ ही करती हैं।
क्या सुन्दर दृश्य होगा कल्पना कीजिए जब घर की सौभाग्यवती स्त्री जिसकी माँग में सिन्दूर सुशोभित हो,नाक में छोटी सी नथनी हो, कानों में कुण्डल हो, हाथ चूड़ियों से भरे हों पाँव में पायल हो, केशों पर फूल लगे हों और वो स्त्री "रै"की नैतण हाथ में पकड़कर छांछ छोल रही हो, कभी दायां हाथ आगे और बायां हाथ पीछे फिर कभी बायां हाथ आगे और दायां हाथ पीछे,दायें और बायें हाथों को आगे पीछे करते हुये सिर की लम्बी चोटी भी कभी दायीं तरफ लस्स कभी बायीं तरफ लस्स (कभी दायीं ओर कभी बायीं ओर झूल रही हैं), कान के कुण्डल भी कानों में आगे पीछे लहरा रहे हों, हाथों की चूड़ी भी खन-खन बज रही हों, मुखमण्डल पर हल्की पसीने की बूँदे मोतियों की तरह चमक रही हो इन सबके बीच पर्या से छांछ छोलने की गर-गर, गर-गर की कर्णप्रिय आवाज आ रही हो, बीच बीच में पर्या के अन्दर हाथ डालकर ये देख रही हो कि नौणी लगी कि नहीं, नहीं लगी हो तो पुनः छांछ छोलने की क्रिया को जारी रखना। ये कार्य स्त्रियों को एकदम फिट रखता था , फिट इंडिया मोवमेंट या जिम तो अब चला, गाँव की स्त्रियाँ तो छांछ छोलके,जँदुर चलाके आज भी शहरों के जिम जाने वालों से ज्यादा फिट और तंदुरुस्त हैं।
छांछ आज से नहीं ये तो अनादि काल से छोली जा रही है हम सब के आराध्य भागवत के नायक प्रातःस्मरणीय भगवान श्री कृष्ण की माता यशोदा जी भी भगवान के लिए इसी विधि से मक्खन बनाती थी लेकिन ये बड़ी बिडम्बना है कि जिस छांछ छोलने वाले पात्रों से बने मक्खन को भगवान श्री कृष्ण को भोग लगाया जाता था आज वो सारे
पात्र अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए अन्तिम सांसे गिन रहे हैं ,अब गाँव के ये पात्र अपना नाम रेड
डाटा बुक में लिखवाने वाली पंक्ति में खड़े हैं। पर्या पर एक प्रसिद्ध चुटकुला भी है जिसे प्रत्येक गाँव वाले
अपने अपने अंदाज में सुनाते हैं उसे यहाँ पर लिखकर इस विषय को यहीं पर विराम देता हूँ कि---
"बल एक गाँव में एक भैंस की मुण्डी(सिर) पर्या के अन्दर फंस गयी। अब भैंस का मालिक बड़ा परेशान,क्या
होगा? ये तो बड़ी समस्या हो गयी, मुण्डी कैसे बाहर निकाले किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, तो उन्होंने
कहा कि चलो गाँव के प्रधान जी के पास चलते हैं वही इसका समाधान करेंगे, तो साब सब चले गये प्रधान
जी के पास समस्या बताई प्रधान जी को, प्रधान जी कुछ देर तक तो विचारणीय अवस्था में थे, जब प्रधान
जी की दिमाग की बत्ती जली (उस समय मेंटोज नहीं था) तो प्रधान जी ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि ऐसा
करो कि पहले भैंस की मुण्डी काटो और उसके बाद पर्या फोड़ो तब भैंस की मुण्डी उस पर्या से बाहर
निकालो। ऐसा ही किया गया सब गाँव वालों ने प्रधान जी के इस साहसिक फैसले के लिए जय जय कार करी
सब बोल रहे थे कि आज प्रधान जी नहीं होते तो बहुत बड़ा नुकसान हो जाता, जय जय कार की इस भीड़
में बस एक व्यक्ति चुप था और वो व्यक्ति था भैंस का मालिक.".......
भाषा शैली और प्रस्तुतकर्ता - रुपेश कुकरेती (गेस्ट प्रवक्ता अर्थशास्त्र)
सहायक लेखक- अमित जखमोला
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