WHAT IS GADYA ?

गद्य

गद्य शब्द गद् धातु में यत प्रत्यय जोड़ने से बना हुआ शब्द है | गद् शब्द का हिन्दी अर्थ बोलना, बतलाना या कहना होता है |

ज्यादातर हम जो भी बातचीत आदि करते हैं वो सभी गद्य में ही बोली जाती है | इसमें कोई भी अपनी बात को किसी दूसरे को काफी ज्यादा आसानी से समझा सकता है और समझ भी सकता है |

हम सभी अपने विचारों को मस्तिष्क में गद्य के रूप में ही सोचते हैं |मनुष्य की बोलने या लिखने पढ़ने की छंदरहित साधारण व्यवहार की भाषा को गद्य (prose) कहा जाता है।

गद्य की भाषा सरल और आसानी से समझने लायक होती है जबकि काव्य की भाषा विशेष होती है। गद्य की भाषा आसान होने के कारण हम अपने विचार आसानी से व्यक्त कर पाते हैं।

आधुनिक हिन्दी विधाओं में गद्य का विकास

आधुनिक हिन्दी गद्य का विकास केवल हिन्दी भाषी क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा।

पूरे देश में और हर प्रदेश में हिन्दी की लोकप्रियता फैली और अनेक अन्य भाषी लेखकों ने हिन्दी में साहित्य रचना करके इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। हिन्दी गद्य के विकास को विभिन्न सोपानों में विभक्त किया जा सकता है। १. भारतेंदु पूर्व युग - 18०० ईस्वी से 185० ईस्वी तक

२.भारतेंदु युग - 185० ईस्वी से 19०० ईस्वी तक

३. द्विवेदी युग -19०० ईस्वी से 19०० ईस्वी तक

४. रामचंद्र शुक्ल व प्रेमचंद युग - 192० ईस्वी से 1936 ईस्वी तक

५. अद्यतन युग - 193 6ईस्वी से आजतक

भारतेंदु पूर्व

हिन्दी में गद्य का विकास 19वीं शताब्दी के आसपास हुआ। इस विकास में कलकत्ता के फोर्ट विलियम कॉलेज की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। इस कॉलेज के दो विद्वानों लल्लूलाल जी तथा सदल मिश्र ने गिलक्राइस्ट के निर्देशन में क्रमश: प्रेमसागर तथा नासिकेतोपाख्यान नामक पुस्तकें तैयार कीं।

भारतेंदु युग

भारतेंदु काल मे कविता के क्षेत्र मे ब्रजभाषा का प्रयोग एवं गद्य के क्षेत्र मे खड़ी बोली का प्रयोग किया गया। खड़ी बोली का विकास इस युग की महत्वपूर्ण घटना है।

इस युग मे पत्रकारिता, उपन्यास, काहानी, नाटक आलोचना, निबंध आदि अनेक गद्य विधाओं का विकास हुआ, जिसका माध्यय खड़ी बोली है।

विशेषताएं

राष्ट्रप्रेम का भाव (2) जनवादी विचारधारा (3) हास्य- व्यंग्य की प्रधानता (4) प्राकृति- वर्णन (5) गद्य एवं उनकी अन्य विधाओं का विकास (6) छंद-विधान की नवीनता (7) भारतीय संस्कृति का गौरवगान

द्विवेदी युग

महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के नाम पर इस युग का नाम द्विवेदी युग पड़ा। द्विवेदी जी को ही खड़ी बोली हिंदी को काव्य भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का श्रेय जाता है।

विशेषताएं

देशभक्ति

अंधविश्वासों एवं रूढ़ियों का विरोध -

अंधविश्वासों एवं रूढ़ियों का विरोध -

मानव प्रेम

द्विवेदी युग के रचनाकार और उनकी रचनाएं

महावीर प्रसाद द्विवेदी - साहित्य की महत्ता

  1. सरदार पूर्ण सिंह - मजदूरी और प्रेम
  2. मैथिलीशरण गुप्त - पंचवटी, साकेत
  3. माखनलाल चतुर्वेदी - समर्पण, युगचरण
  4. रामनरेश त्रिपाठी - मिलन, पथिक
  5. बाबू श्यामसुंदर दास - समाज और साहित्य
  6. चंद्रधर शर्मा गुलेरी - कछुआ धर्म

रामचंद्र शुक्ल एवं प्रेमचंद युग‌

गद्य के विकास में इस युग का विशेष महत्त्व है। पं रामचंद्र शुक्ल (1884-1941) ने निबंध, हिन्दी साहित्य के इतिहास और समालोचना के क्षेत्र में गंभीर लेखन किया।

हिंदी शब्दसागर की भूमिका के रूप में लिखा गया उनका इतिहास आज भी अपनी सार्थकता बनाए हुए है। जायसी, तुलसीदास और सूरदास पर लिखी गयी उनकी आलोचनाओं ने भावी आलोचकों का मार्गदर्शन किया।

 

कथा साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद ने क्रांति ही कर डाली। अब कथा साहित्य केवल मनोरंजन, कौतूहल और नीति का विषय ही नहीं रहा बल्कि सीधे जीवन की समस्याओं से जुड़ गया। उन्होंने सेवा सदन, रंगभूमि, निर्मला, गबन एवं गोदान आदि उपन्यासों की रचना की। उनकी तीन सौ से अधिक कहानियां मानसरोवर के आठ भागों में तथा गुप्तधन के दो भागों में संग्रहित हैं।

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