भगवान शिवको तेस्रो आँखा,२४ घण्टाभित्र तपाइले सोचेको काम बन्नेछ, फोटो छोई ॐ लेखि सेयर गरौं
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भगवान शिव के जन्म के पीछे का है एक बड़ा रहस्य, आखिर कौन है इनके माता-पित
हिंदूधर्म में भगवान शिव को देवों का देव कहा जाता है यह त्रिदेव है भगवान शिव जी के बहुत से नाम है। शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान शिव के 108 नाम है। महादेव भोलेनाथ शंकर महेश रुद्र नीलकंठ इत्यादि इनको तंत्र साधना में भगवान शिव को भैरव के नाम से भी जाना जाता है हिंदू धर्म के प्रमुख देवताओं में भगवान शिवजी एक हैं वेद में इनको रुद्र के नाम से जाना गया है भगवान शिव इंसान की चेतना के अंतर्यामी है इसलिए वह किसी भी इंसान के मन की बात तुरंत पढ़ लेते है।
रूद्र के नाम से भी जाने जाते है त्रिदेव
भगवान शिवजी के 2 पुत्र कार्तिकेय और भगवान गणेश जी हैं और इनकी एक पुत्री भी है जिसका नाम अशोक सुंदरी है भगवान भोलेनाथ का ज्यादा से ज्यादा समय योगी या ध्यान की मुद्रा में ही रहता है इस बा का अंदाजा आप भगवान की फोटो या मूर्तियों में देख कर लगा सकते हैं।
भगवान शिव के जन्म की कथा | Shuddh Sanatanयह हमेशा ध्यान में ही लीन रहते हैं परंतु इनकी पूजा शिवलिंग और मूर्ति दोनों ही रूपों में होती है शिवजी के गले में आप हमेशा नाग लिपटा देखते होंगे। हाथ में डमरू और त्रिशूल लेकर दिखाई देते है।
भगवान शिव जी ने अपने शरीर से देवी शक्ति की सृष्टि की है जो उनके अपने अंग से कभी अलग होने वाली नहीं थी देवी शक्ति को पार्वती के रूप में जाना गया है और भगवान शिव को अर्धनारिश्वबर के रूप में जाना जाता है देवी शक्ति को प्रकृति गुणवती बुद्धितत्व की जननी तथा विकार रहित माना गया है श्रीमद् देवी महापुराण के अनुसार भगवान शिव के पिता के लिए भी एक कथा है।
देवी महापुराण के अनुसार एक बार जब नारद जी ने अपने पिता ब्रह्मा जी के सामने यह प्रश्न रखा कि इस सृष्टि का रचयिता कौन है? किसने इसका निर्माण किया आप ने भगवान विष्णु ने या फिर भगवान शिव जी ने, इन तीनों को जन्म किसने दिया है यानी आप तीनों के माता पिता कौन है। तभी ब्रह्मा जी ने नारद जी से त्रिदेवों के जन्म की बात बड़े ही विस्तार से करते हुए बताया कि देवी दुर्गा और शिव स्वरूप ब्रह्मा के योग से ब्रह्मा विष्णु और महेश की उत्पत्ति हुई है यानी प्रकृति स्वरूप दुर्गा ही माता है और ब्रह्मा यानी काल सदाशिव पिता है एक बार श्री ब्रह्मा जी और श्री विष्णु जी का इस बात पर लड़ाई हुई, ब्रह्मा जी ने कहा कि मैं तेरा पीता हूं क्योंकि यह सृष्टि मुझसे उत्पन्न हुई है मैं प्रजापिता हूं इस पर विष्णु जी ने कहा कि मैं तेरा पिता हूं तू मेरी नाभि कमल से उत्पन्न हुआ है।
दोनों के झगड़े के बीच आखिरकार सदा शिव को आना ही पड़ा। उन्होंने विष्णु जी और ब्रह्मा जी के बीच में आकर कहा, है पुत्रों मैंने तुमको जगत की उत्पत्ति और स्थिति रूपी दो कार्य दिए हैं इसी प्रकार मैंने शंकर और रूद्र को दो कार्य संहार और तिरोगति दिए हैं मुझे वेदों में ब्रह्म कहा है मेरे पांच मुख हैं एक मुख से अकार (अ) दूसरे मुख से उकार (उ) तीसरे मुख से मुकार (म) चौथे मुख से बिन्दु (.) तथा पाँचवे मुख से नाद (शब्द) प्रकट हुए हैं उन्हीं पाँच अववयों से एकीभूत होकर एक अक्षर “ऊँ” बना है यह मेरा मूल मंत्र है।
उपरोक्त शिव महापुराण के प्रकरण से यह सिद्ध हो गया कि श्री शंकर जी की माता श्री दुर्गा देवी है तथा पिता सदाशिव अर्थात काल ब्रह्म है।
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