"बाबा की दिव्य बगीचे में मज़ेदार सब्ज़ी😆😆😆"

एक बार की बात है, एक गांव में एक आदमी नामक खुदाई बाबा रहते थे। ये बाबा थोड़े अजीबोगरीब थे और उनके पास अपार धार्मिक ज्ञान था। वे हर रोज़ उपदेश देने और लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन एक बार एक मनोरंजक घटना हुई जिसने उनकी शांति को हिला दिया।
एक दिन, गांव के बच्चे-बच्चे ने एक खेल खेलने की सोची। वे सभी बाबा के पास गए और बोले, "बाबा, हम आपके पास एक खेल खेलने आए हैं। हमारे पास दो बगीचे हैं, एक आपका और एक हमारा। हम इस खेल में आपके बगीचे की एक सब्ज़ी उगा कर दिखाएँगे और आपको यह बताना होगा कि यह आपके बगीचे की सब्ज़ी है या हमारे बगीचे की।"
बाबा ने हंसी में झूमते हुए कहा, "ठीक है, मैं तयार हूँ। लेकिन ध्यान रखना, मैं बड़ी सीधी-साधी सब्ज़ी उगाने वाला नहीं हूँ। मेरी सब्ज़ी ने तो स्वर्ग भी देखा है!"
इसके बाद बच्चे खेल की तैयारी करने लगे। एक हफ्ता बाद, वे बगीचे के साथ लौटे और खेल शुरू हुआ। पहले एक बच्चा आया और एक गाजर उगा कर बाबा के सामने रख दी। बाबा ने घमंड से इसे देखा और कहा, "हा! यह मेरी बगीचे की सब्ज़ी है।"
उसी तरह दूसरे बच्चे ने एक टमाटर उगाकर दिखाया और बाबा ने फिर से आड़े हाथों हँसते हुए कहा, "हा! यह भी मेरी बगीचे की सब्ज़ी है।"
अब बारी एक चिंच स्वर्गिया फूल की आई। बच्चे बड़ी उम्दा चाल चलकर उसे बाबा के सामने रख दिया। बाबा ने इसे देखते ही चकरा गये और कहा, "ये, ये तो नहीं हो सकता! यह तो मेरी बगीचे की सब्ज़ी नहीं हो सकता। यह तो स्वर्ग से आया हुआ लग रहता है।"
सभी बच्चे और लोग हँसी से भरे हुए थे। बाबा ने गुस्से में वजह पूछी। एक बच्चा ने हंसते हुए कहा, "बाबा, हमने आपके पास सबसे पहले एक गाजर लाए, फिर एक टमाटर लाए, और अंत में एक चिंच स्वर्गिया फूल। लेकिन आपने सबको अपनी सब्ज
़ी बताया है। हमने सिर्फ एक चीज़ उगाई है और आपने तो स्वर्ग से भी ऊँचा दावा किया है!"
बाबा के मुंह से हँसी के आवाज़ निकली और उन्होंने कहा, "तुम लोगों ने मुझे पकड़ लिया! हाँ, मेरी सब्ज़ी नहीं है, ये सब तो तुम बच्चों द्वारा उगायी हुई है। मैंने तो बस ढेर सारे दिव्य विचार और अद्भुत उपदेश देने के लिए अपनी बगीचे बनाई है, सब्ज़ी नहीं।"
इस उद्यम से सबको बहुत मज़ा आया और सभी ने मिलकर बाबा के साथ हंसी में झूम लिया। बाबा भी हँसते हुए कहने लगे, "आरे, वाह, जब तक तुम लोगों ने नहीं बताया, मुझे पता ही नहीं था कि मेरी बगीचे में सब्ज़ी उग रही है! अब मैं तो खुद ही इन सब्ज़ियों को पसंद कर लूँगा।"
इस घटना के बाद से, उस गांव में सभी बच्चे और बड़े-बुज़ुर्ग बाबा के मजाक उड़ाने में लग गए और हर रोज़ खेल-खिलाड़ी और मस्ती करने में खो जाते थे। और इस तरह, बाबा की बगीचे सब्ज़ियाँ नहीं बस उनकी दिव्य वाणी और मज़ेदार उपदेश उगते रहे, बल्कि हर किसी के चेहरे पर हँसी बनी रहती।
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