भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ :
ऋग्वेद में स्पष्टतः कहा गया है 'सा संस्कृति प्रथमा विश्वम्वारा' अर्थात आदि संस्कृति विश्ववारा या विश्व कल्याण के लिए थी। उत्खनन एवं पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर भी हमें भारतीय संस्कृति का विश्व स्वरूप दिखाई देता है। चीन की दीवार के उत्तरी दरवाजे पर संस्कृत भाषा में आज भी उल्लेख है- 'यक्षों के द्वारा परमेश्वर हमारी रक्षा करें'
- ऋग्वेद में उल्लिखित सहिष्णुता को इंगित करता है। जैन दर्शन का स्यादवाद एवं सप्तभंगीनय का सिद्धान्त धार्मिक सहिष्णुता का ही प्रतिपादक है। सम्राट अशोक का 12वां शिलालेख धार्मिक सहिष्णुता की अतुल्य मिसाल है- मनुष्य को अपने धर्म का आदर तथा दूसरे के धर्म की कभी निन्दा नही करनी चाहिए।'
5. सर्वांगिणता व सार्वभौमिकता :- भारतीय संस्कृति
मानव जीवन के सभी पक्षों के सम्यक विकास पर बल देती है। वैशेषिक दर्शन में धर्म उसे कहा गया है जिससे लौकिक व पारलौकिक दोनों सुखों की प्राप्ति होती है। मनीषियों ने विश्वबन्धुत्व एवं 'वसुधैवकुटुम्बकम' जैसे उदान्त सिद्धान्तों का प्रथम उद्घोष करते हुए सार्वभौमिकता के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।
6. विभिन्नता में एकता :- वस्तुतः भारत की एकता का सूत्रपात नन्दराज ने किया, जिसे चन्द्रगुप्त मौर्य ने आगे बढाया तथा अशोक ने इसे पूरा किया। यह भारतीय संस्कृति की सर्वप्रमुख विशेषता है।
वी.ए. स्मिथ ने अपनी पुस्तक 'द ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इण्डिया फ्रॉम द अरलियस्ट टामम्स ए एण्ड ऑफ 1911' में 'भारत में एकता में अनेकता और अनेकता में एकता' का विचार प्रस्तुत किया। प. जवाहरलाल नेहरू ने 'डिस्कवरी ऑफ इण्डिया' में कहा है कि' भारतीय एकता कोई बाहर से थोपी हुई चीज नही है यह बहुत गहरी है जिसके अन्दर तरह तरह के विश्वासों तथा प्रथाओं को स्वीकर करने की भावना है।' यह नेहरू ही थे, जिन्होने भारत की विविधता का वर्णन करते हुए 'अनेकता में एकता' का विचार हमे दिया। राष्ट्र निर्माण के तत्वों में 'भूमि' सर्वप्रधान एवं महत्वपूर्ण है। अतः भारतीय संस्कृति के विकास के लिए प्रथमतः समान भूमि का तत्व ही उत्तरदायी रहा है।
अथर्ववेद के 'पृथ्वीसूक्त' में 'भूमिमाता है तथा मैं पृथ्वी का पुत्र हैं' कहकर देशप्रेम के भारतीय दृष्टिकोण को स्पष्टतः व्यक्त किया गया है।
विष्णु पुराण में भारत भूमि की प्रशंसा करते हुए कहा गया है- 'धन्य है वे लोग, जो भारत भूमि में उत्पन्न हुए है। यहाँ की भूमि स्वर्ग से बढ़कर है क्योंकि यहाँ स्वर्ग के साथ साथ अपवर्ग (मोक्ष) की भी साधना होती है।'
अशोक का साम्राज्य असम से लेकर हिन्दुकश और पामीर से लेकर सुदूर दक्षिण तक विस्तृत था और इस देश के ऐतिहासिक काल में सबसे बड़ा था।
हर्बट रिजले के अनुसार" भारत में अनेक प्राकृतिक एवं सामाजिक विविधताओं, भाषाओं प्रथाओं तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बीच हिमालय से कन्याकुमारी तक एक निश्चित आधारभूत समरूपता अब भी देखी जा सकती है। वस्तुतः यहाँ एक समान
म्यूर के अनुसार- 'भारत के प्राकृतिक सौन्दर्य की भव्यता, विविधता और वनस्पतियों के उत्पादन की समूची दुनिया में बराबरी नहीं।'
सर वाल्टर रेले ने लिखा है कि- 'प्रथम मानव प्राणी का निर्माण भारत खण्ड में हुआ।'
कर्नल अल्काट ने मानव संस्कृति का उद्गम स्थल भारत वर्ष को माना है।
जब फ्रांसीसी दार्शनिक वाल्टेयर को ऋग्वेद की एक प्रति भेंट की गई तब उनके उद्गार थे- "यह देन इतनी अमूल्य है कि पाश्चात्य राष्ट्र सदैव पूर्व के प्रति ऋणी रहेंगे।"
मैक्समूलर ने लिखा है कि यदि कोई मुझसे पूछे कि मानवी अन्तःकरण एवं बुद्धि की परिपूर्णता एवं शक्ति किस देश में अधिक चरम सीमा तक पहुँची है? संसार के गूढतम रहस्यों का विश्लेषण किस देश में हुआ है? प्लेटों केंट आदि के दर्शन के अध्ययन के बाद भी अध्ययन योग्य विषय किस देश में सुलझाये गए है? तो मैं त्वरित उत्तर दूंगा हिन्दूस्तान में।"
- प्राचीनता एवं निरन्तरता :- भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियो में से एक है। यूनान, रोम आदि देशों में सभ्यता का प्रादुर्भाव भारत के बहुत बाद में हुआ। मिश्र, श्री सुमेर, बेबीलोन, यूनान और रोम की संस्कृतियां लुप्त होकर प अतीत की कहानी मात्र रह गई है किन्तु भारतीय संस्कृति निर्बाध रूप से पिछले 5000 वर्षों से चली आ रही है। भारत का अतीत उसके वर्तमान जीवन से अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध है।
2. आध्यात्मिकता :- आध्यात्मिकता या धार्मिकता,छठ भारतीय संस्कृति का प्राण है। प्राचीन समाज में पुरूषाथों तथा के आश्रम व्यवस्था का विधान, मनुष्य की आध्यात्मिक साधना के बह ही प्रतीक है। पुरूषाथों में 'धर्म' को प्रमुखता देते हुए महाभारत - क में लिखा गया है कि 'जो धर्म के द्वारा उन्नति करे वही विद्वान व कर गुणवान है "सर्वे भवन्तु सुखिनः" इस संस्कृति का मूल मन्त्र है।
3. गृहणशीलता व समन्वयवादिता :- यवन, शक, कुषाण, हूण आदि विदेशी जातियों के प्रबल आक्रमणों को भारतीय संस्कृति ने शान्त व गम्भीर भाव से झेलते हुए क्रमशः इन विदेशियों को अपनी धारा में समाहित कर लिया। शक रूद्रदामन वैदिक है धर्म व संस्कृति का पोषक बना तो कनिष्क ने बौद्ध धर्म ग्रहण ब्लार कर इसके प्रचार प्रसार में अपने सभी साधनों को लगा दिया। मिनाण्डर ने बौद्ध संघ में 'अर्हत' पद प्राप्त किया। गौतम बुद्ध समन्वयवादी थे।
गीता में ज्ञान, कर्म एवं भक्ति के बीच समन्वय स्थापित किया गया है। 'समवाय' या 'समन्वय' की अवधारणा ने ही भारत के दीर्घकालीन इतिहास के समस्त राजनैतिक एवं रसास्कृतिक विकास को नियन्त्रित करते हुए उसे एकता के सूत्र में आबद्ध होने के मार्ग पर अग्रसर किया है।
4. धार्मिक सहिष्णुता :- 'एक सद् विप्रा बहुधा वदन्ति'
अण्डमान-निकोबार, कोचीन तथा त्रावणकोर की कदार व पलियन जनजातियों, असम के अंगाभी नागाओं, बिहार की राजमहल पहाड़ियों में बसने वाली बांगड़ी तथा ईरूला समूह इससे सम्बन्धित है।
2. प्रोटो आस्ट्रलायड :- ये भारतीय जनसंख्या के आधार
भूत अंग थे। आदिम कबीलों की मानखमेर, मुण्डा बोलियां इसी वर्ग की है। तिनेवेल्ली से प्राप्त प्रागैतिहासिक कपालों में इस प्रजाति के तत्व मिलते है। संस्कृत साहित्य में वर्णित 'निषाद' इसी वर्ग के है। अधिकांश दक्षिण भारत तथा मध्यप्रदेश की कुछ जनजातियाँ में इस प्रजाति के लक्षण है। नाग, मकर, कच्छप पूजा, चन्द्रगणना, निछावर प्रथा, लिंगोपासना, मृत्योत्तर विश्वास, आदि भारतीय संस्कृति को इसकी देन रही है।
3. मंगोलायड :- इस प्रजाति के तत्व मीरी, नागा, बोडो,
गोंड, भोटिया तथा बंगाल-असम की जातियों में मिलते है। इनकी भाषा चीनी-तिब्बत समूह (किरात) की भाषा से मिलती है। तन्त्र, वामाचार, शक्तिपूजा आदि धार्मिक कृत्यों का आविर्भाव मंगोल जाति के प्रभाव की देन है।
4. मेडीटरेनियन (भू-मध्य सागरीय) :- इस प्रजाति के
वंशज भारत में बड़ी संख्या में विद्यमान है। इनकी एक शाखा कन्नड़, तमिल, मलयालम भाषा प्रदेश में, दूसरी पंजाब व गंगा की ऊपरी घाटी में तथा तीसरी सिन्ध, राजस्थान तथा पश्चिमी उत्तरप्रदेश में पायी जाती है। सामान्यतः इस प्रजाति का सम्बन्ध 'द्रविड़' (द्रमिल) जाति से है। नौ-परिवहन, कृषि-व्यापार-वाणिज्य, नगरीय सभ्यता का भारत में सूत्रपात इसी प्रजाति की देन है।
5. पश्चिमी ब्रेकाइसेफलस (अल्पाइन, डिनारिफ,
आर्मीनायड) :- अल्पाइन शाखा- गुजरात, बिहार, उत्तर तथा मध्य भारत में, डिनारिफ शाखा- बंगाल, उड़ीसा, काठियावाड़, कन्नड़ तथा तमिल भाषी क्षेत्र में तथा आर्मिनायड शाखा- मुम्बई के पारसियों में दृष्टिगोचर होती हैं
6. नार्डिक :- इस प्रजाति को 'आर्यों का प्रतिनिधि'
तथा 'हिन्दू सभ्यता का जनक' कहा जाता है। सर्वप्रथम यह प्रजाति पंजाब में बसी, तत्पश्चात देश के अन्य भागों में फैल गई। 'आर्य' वस्तुतः एक भाषिक पद है। जिससे भारोपीय मूल के एक भाषा समूह का बोध होता है।
- भारत का नामकरण
जनसमुदास की दृष्टि से 'भरत' नाम सर्वप्रथम ऋग्वेद में मिलता है। एक भू-भाग के रूप में 'भारतवर्ष' शब्द सर्वप्रथम प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व के खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख में मिलता है। भारतवर्ष अर्थात्-भरतों का देश।
अशोक के अभिलेखों में हमारे देश का नाम 'जम्बूद्वीप'
मिलता है। जम्बू नामक वृक्ष की उपलब्धता के कारण इसे 'जम्बूद्वीप' कहा गया। (प्रथम गौण शिलालेख)
सिन्धु नदी के पूर्वी क्षेत्र के लिए फारसियों ने (ईरानियों) फारसी भाषा में 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग किया। अरबी लोगों ने इस क्षेत्र को 'अलहिन्द' नाम दिया। तुर्क मुसलमानों ने 'हिन्दुस्तान' तथा उनकी भाषा को 'हिन्दवी' नाम दिया।
'हिन्दुस्तान' नाम का प्राचीनतम प्रयोग 262 ईस्वी में उत्कीर्ण सासानीय (ईरानी) शासक शापुर प्रथम के ' नक्श-ए-रुस्तम' लेख में मिलता है। यह लेख ईरानी, पहलवी तथा ग्रीक-यूनानी भाषा में है।
एक प्रदेश के रूप में' भारत' का प्रथम सुनिश्चित उल्लेख पाणिनी की पुस्तक 'अष्टाध्यायी' (पाँचवी शताब्दी ईसा पूर्व) में मिलता है, यह 22 जनपदों में से एक जनपद था।
फारसी में 'हिन्दू', यूनानी में 'इण्डोस', हिब्रू में 'होडू', लेटिन में 'इन्डस' तथा चीनी भाषा में 'तिएनचू' शब्द 'सिन्धु' शब्द के लिए प्रयुक्त हुए हैं।
यूनानियों ने इस देश को 'इण्डिया' नाम दिया। (सर्वप्रथम - हेरोडोटस)
जब आर्य भारत आयें तो इनके निवास स्थान को 'सप्त सैन्धव' कहा गया। इसमें पंजाब, सिन्ध एवं अफगानिस्तान का क्षेत्र सम्मिलित था, जहां ऋग्वेद की रचना हुई।
मनु स्मृति में सरस्वती तथा दृषद्वती नदियों के बीच के क्षेत्र को 'ब्रह्मवर्त' तथा गंगा-यमुना दोआब क्षेत्र को 'ब्रह्मर्षि' कहा गया है।
मनु स्मृति में पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक तथा हिमालय से लेकर विंध्याचल के बीच के भाग को 'आर्यावर्त' कहा गया है। राजशेखर की काव्य मीमांसा में भी नर्मदा नदी के उत्तर के भाग को 'आर्यावर्त' कहा गया है।
सन् 982 ईस्वी में एक अज्ञात लेखक द्वारा लिखित पुस्तक 'हुडूड अल आलम्' में 'हिन्दुस्तान' शब्द का प्रयोग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के लिए किया गया है।
चीनी यात्रियों में सर्वप्रथम झान्ग कियान (Zhang Qiam) ने सिन्धु नदी के निचले भाग को 'शेन-दू' नाम दिया। कालान्तर में ह्वेनसाँग (Xuan-Zang) ने भारत के लिए 'तिएन-चू' तथा 'इन-तु' शब्दों का प्रयोग किया। इत्सिंग ने भारत के लिए 'आर्य देश' तथा 'ब्रह्म राष्ट्र' जैसे शब्दों का प्रयोग किया।
विष्णु पुराण - "समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में जो कल्पित है वह भारत देश है तथा वहां की सन्तानें
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