एक प्रदेश के रूप में सबसे पहले भारत का वर्णन पाणिनि की अष्टाध्यायी में है। मनुस्मृति एवं भागवत पुराण में भारत को देवनिर्मित देश कहा गया है। सोमदेवसूरि के नीतिवाक्यामृतम् में सर्वप्रथम भारतवासी के अर्थ में भारतीयाः शब्द का प्रयोग किया गया है।
प्रथम 262 ई. (तीसरी सदी) में ईरान के सासानी शासक शाहपुर प्रथम के नक्श-ए-रुस्तम अभिलेख में इस देश का नाम हिन्दुस्तान' मिलता है। यह लेख तीन भाषाओं (ईरानी, पहलवी तथा ग्रीक या यूनानी) में रचित है। महत्वपूर्ण है कि इस समय भी हिंदुस्तान नाम सिन्धु तथा उसके डेल्टा के लिए ही था।
सर्वप्रथम 9वीं/ 10वीं शताब्दी में किसी अज्ञात लेखक द्वारा रचित फारसी ग्रंथ हुडूड-अल-आलम में हिंदुस्तान शब्द से पूरे उपमहाद्वीप को वर्णित किया गया है। अमीर खुसरो भारत को हिन्द तो इसामी ने हिन्दुस्तान कहकर सम्बोधित किया है।
अमीर खुसरो ने भारत को पृथ्वी का स्वर्ग कहा है। खुसरी के अनुसार "हिन्द ने दुनियां को गिनती, पंचतंत्र तथा शतरंज का ज्ञान दिया है।"
इसामी ने हिन्दुस्तान का गुणगान निम्नलिखित रूप में किया है-
मुल्के हिंदुस्तान की खुशहाली के भी क्या कहने,
खुद फिरदौस (स्वर्ग) भी इस बगिया से रश्क (ईर्ष्या) करें है।
इसका इलाका धरती के माथे का गहना
जैसे सुंदर दुल्हन के मुखड़े का तिल हो।
जब आर्य भारत आये तो इसका नाम सप्तसैंधव पड़ा। सरस्वती शतुद्री, विपाशा, परुष्णी, असिक्नी, वितस्ता और सिन्धु-इन सात नदियों द्वारा सिंचित प्रदेश को ही सप्तसैंधव कहा गया। इसमें पंजाब, सिंधु एवं अफगानिस्तान के क्षेत्र सम्मिलित थे। वहीं आर्यों का पहला निवास स्थान बना। यहीं पर ऋग्वेद की रचना हुई थी।
सर्वप्रथम ऐतरेय हाह्मण में भारतीय उपमहाद्वीप का पाँच भागों में विभाजन किया गया।
मध्यदेश :- यमुना से ब्रह्मपुत्र तक का मैदानी क्षेत्र।
उत्तरापथ:- उत्तर-पश्चिम भारत उत्तरापथ कहलाता था।
प्रातीच्य वा अपरान्त :-पश्चिमी भारतीय भाग था।
प्राच्य:- पूर्वी भारत को कहा जाता था।
दक्षिणापथ पेरिप्लस आफ द इरिब्रियन सी के लेखक ने नामादोस (नर्मदा) के दक्षिण में स्थित भू-भाग को दाखिनाबादेस कहा है।
द्राविड़ देश कृष्णा एवं तुंगभद्रा के दक्षिण में स्थित प्रदेश को तमिलहम् या द्रविड़ देश कहा जाता है। पेरिप्लस में इसी क्षेत्र को दमिरिका (दमिलकम) कहा गया है।
मनुस्मृति में सरस्वती एवं दृषद्वती के बीच का क्षेत्र ब्रह्मावर्त तथा गंगा यमुना दोआब क्षेत्र ब्रह्मर्षि देश बताया गया है।
विष्णु पुराण में कहा गया है "समुद्र के उत्तर में तथा हिमालय के दक्षिण में जो कल्पित है वह भारत देश (भरतवर्ष) है तथा वहां की सन्तानें भारतीय हैं। यहाँ भरत के उत्तराधिकारी लोग निवास करते हैं। देवता भी स्वर्ग का सुख भोग लेने के बाद मोक्ष की साधना हेतु भारत में पुनःजन्म लेते हैं।"
हिमालय एवं विन्ध्याचल के बीच के क्षेत्र को मध्य देश कहा गया है। जब आर्यों का पूर्वी भारत की ओर भी प्रसार हुआ तो इस देश को आर्यावर्त कहा गया। मनुस्मृति में पूर्वी समुद्र से लेकर पश्चिमी समुद्र तक और विन्ध्याचल एवं हिमालय पर्वतों के बीच के भाग अर्थात् पूरे उत्तरी भारत को आर्यावर्त कहा गया है।
राजशेखर ने नर्मदा नदी के तर एवं दक्षिण के बीच की सीमा रेखा माना। पुराणों में नर्मदा नदी को मेकल पर्वत की कन्या बेकलसुत्ता कहा गया है। हिन्दुकुश पर्वत को यूनानी लेखकों ने पैरोपनिसस या इण्डियन काकेशस कहा। स्मिय इसे ही भारत की वैज्ञानिक सीमा मानते हैं। हिमालय का उत्तर-पश्चिमी भाग सुलेमान और हिन्दूकश पर्वतों के नाम से विख्यात है।
चीनियों ने हिमालय पर्वत को सुंग-लिन तथा सिन्धु द्वारा सिंचित भारतीय क्षेत्र को तिएन-चू कहा। कालिदास ने हिमालय को 'देवतात्मा' कहा है। कालिवास के अनुसार, "पर्वतों का राजा हिमालय, अध्यात्मवाद को धारण किये हुए दो समुद्रों के बीच ऐसे खड़ा है जैसे कि पृथ्वी को नापने वाला डण्डा हो।"
बृहत्तर भारत (Greater India)- सर्वप्रथम मत्स्य पुराण में वृहत्तर भारत की अवधारणा मिलती है
जिसमें भारतवर्ष के साथ दक्षिण पूर्व एशिया के आठ अन्य द्वीपों को सम्मिलित किया जाता है। इसमें ताम्रपर्णी (श्रीलंका), कम्बोडिया, सुमात्रा, जावा, चम्पा (अन्नाम) आदि सम्मिलित थे। समुद्र पार के भारतीय प्रदेशों को द्वीपान्तर कहा जाता था।
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