जगत का नियंत्रण एवं संचालन करने वाली त्रिगुणात्मक शक्ति की आराधना के लिए नवरात्र के दिनों का समय सर्वोत्तम माना गया है। 9 दिनों में मां के अलग.अलग रुपों की पूजा करने का विधान है। आदि शक्ति मां दुर्गा की पूजा जब जैसा समय हो वैसे लोग अपनी अपनी परंपरा के अनुसार करते रहते हैं लेकिन नवरात्र में इस पूजा का विशेष महत्व होता है। फिर चाहे वह चैत्र की बात हो या अश्विन नवरात्रि की। साल में दो और नवरात्रि आती है जिसे गुप्त नवरात्रि कहते हैं, जो आषाढ़ और पौष मास में आते हैं। सेहत के दृष्टि से भी नवरात्र के दिनों का बहुत अधिक महत्व है। आयुर्वेद में कहां गया है कि मौसम बदलते समय स्वास्थ्य बिगड़ने की विशेष संभावना ज्यादा रहती है इसलिये इन सभी में वमन.-विरेचन आदि पंचकर्म करने का विधान है। इसे शरीर शुद्ध होता है और रोग होने की संभावना भी कम हो जाती है। व्रती भाव से फल-फूल खाकर नियम पूर्वक रहने से दावा के द्वारा जो ना ठीक हो सकते हैं, वह रोग भी नवरात्र व्रत करने के कारण पथी भोजन करने से ठीक हो जाते हैं। ऐसे में माँ दुर्गा जी की आराधना की जाए तो तन और मन दोनो ही शुद्ध हो जाते हैं। देवी भागवत में इस बात को बताते हुए व्यास जी ने जन्मजय से कहा कि शरद और बसंत दोनो श्रृतुओं में यमराज के दांत की तरह भयानक मान गई है। इन श्रृतुओं में प्रणियों में बड़े.बड़े रोग जन्म लेते हैं। अतः चैत्र और अश्विन के पवित्र महीनो में यत्नपूर्वक दुर्गा माँ की अर्चना की जाए तो माँ भगवती सभी प्राणियों की रक्षा करती हैं। देश के विभिन्न भागो में मां दुर्गा की पूजा का उत्सव मनाये जाने के रीति रिवाजों में भले ही कुछ अंतर हो किंन्तु व्रत रख कर श्रद्धापूर्वक माँ भगवती की आराधना करने का विधान सभी जगह एक समान देखने को मिलता है। वेदो में नवरात्र की महिमा और दुर्गा पूजा के विषय में अथर्वेद में वर्णन मिलता है कि माता दुर्गा का पूजन करना इसलिये और अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि पृथ्वी से लेकर सभी देवी देवताओ का अधिष्ठापन माँ भगवती दुर्गा में ही है। इसीलिये माँ दुर्गा का पूजन करने से सभी देवी देवताओ के पूजन का फल मिल जाता है।
हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तक दुर्गा सप्तशती के दूसरे अध्याय में भी वर्णन है कि सभी देवताओं के तेज से ही भगवती दुर्गा प्रकट हुई है। माँ दुर्गा के नव रूप माने गए हैं, प्रथम माँ शैलपुत्री, द्वितीय माँ ब्रह्मचारिणी, तृतीय माँ चंद्रघंटा, चतुर्थ माँ कुष्मांडा, पंचम माँ स्कंदमाता, षष्ठी माँ कात्यायनी, सप्तम माँ कालरात्रि, अष्टम माँ महागौरी एवम नवम माँ सिद्धिदात्री। नवरात्रों में दिनों के क्रम में माँ दुर्गा के इन्ही नव स्वरूपों की पूजा होती है तथा लोग नव स्वरूपों की पूजा नवरात्र के नव दिनों में मां शैलपुत्री आदि देवियों के क्रम से करते हैं। कुछ लोग प्रतिदिन सभी स्वरूपों की पूजा करते हैं, परन्तु जिस विधि से भी आप माँ दुर्गा को पूजे, उसके लिए मन में श्रृद्धा होना बहुत जरूरी है। शास्त्रों में रात्रि काल में देवी पूजा का विशेष फल माना गया है क्योंकि देवी रात्रि स्वरूप है, जबकी शिव को दिन स्वरूप माना गया है। अतः नवरात्र व्रत में रात्रि व्रत का विधान है। भक्ति और श्रृद्धा पूर्वक माता की पूजा दिन और रात्री में कभी भी जा सकती है। नवरात्र के प्रथम दिन घट की स्थापना के साथ दैनिक पूजा भी बहुत ही सरल विधि से की जा सकती है। घट की स्थापना-जहां घट की स्थापना करनी हो उस स्थान को साफ करके गंगाजल का छिड़काव करें। फिर अष्टदल बनाएं, उसके ऊपर एक लकडी का पाटा रखें और उस पर लाल रंग का वस्त्र बिछाएं। सर्वप्रथम थोडे से चावल रखकर गणेश जी का स्मरण करते हुए स्थान ग्रहण करने का अग्राह करें। वस्त्र के ऊपर पांच स्थान पर थोड़े चावल रखें। जिन पर क्रमशः गणेश जी, मातृका, लोकपाल, नवग्रह तथा वरूण देव को स्थान दें और स्थान ग्रहण करने का आग्रह करें। फिर गंगाजल से सभी को स्नान करायें। स्नान के बाद तीन बार कलावा लपेट कर प्रत्येक देव को वस्त्र अर्पित करें। देवों को स्थान देने के बाद आप अपने कलश के अनुसार सातवें स्थान पर जौ मिली मिट्टी बिछायें। कलश में जल भरें। अब कलश में थोड़ा और जल गंगा जल डालते हुए ओम वरुणाय नमः मंत्र का जाप करते हुए कलश को पूर्ण रूप से भर दे। इसके बाद आम की लकड़ी डाले, जौ या कच्चे चावल कटोरे में भरकर कलश के ऊपर राखे। कपडे से लिपटा हुआ कच्चा नारीयल कलश पर रखकर कलश को माथे के सामने लाए और वरुण देवता को प्रणाम करते हुए रेत पर कलश को स्थापित करें। कलश के ऊपर रोली से ओम या स्वास्तिक लिखें मां भगवती का ध्यान करते हुए अब आप मां भगवती की तस्वीर को स्थान दें। दीपक प्रज्जवलित करें। यदि आप अखंड ज्योति अर्पित करना चाहते हैं तो सूर्य देव का ध्यान करते हुए उन्हें अखंड ज्योति का गवाह रहने का अनुरोध करते हुए ज्योत को प्रज्ज्वलित करें। वह ज्योति पूरे 9 दिन तक जलती रहना चाहिए। इसके बाद मन में ही संकल्प लें कि मै आज नवरात्र की प्रतिपदा से आपकी आराधना अमुक कार्य के लिए कर रहा हूँ या कर रही हूँ। मेरी पूजा स्वीकार करके ईष्ट कार्य को सिद्ध करें। पूजा के समय यदि आपको कोई भी मंत्र नहीं आता हो तो केवल दुर्गा सप्तशती में दिए गए नर्वाण मंत्र ॐ ऐं ह््रीं क्लीम चामुंडाये विच्चे से भी पूजन सामग्री चढ़ा सकते हैं। माँ आदि शक्ति का यह मंत्र अमोघ है। यदि आप दुर्गा सप्तशती पाठ करते हैं तो संकल्प लेकर पाठ प्रारंभ करें। सिर्फ कवच आदि का पाठ कर व्रत रखना चाहते हैं तो माता के नौ रूपों का ध्यान करके कवच और स्त्रोत का पाठ करें। फिर आरती करें। दुर्गा सप्तशती का पाठ 1 दिन में नहीं करना चाहते हैं तो दुर्गा सप्तशती में दिए श्री दुर्गा सप्तश्लोकी का 11 बार पाठ करके अंतिम दिन 108 आहूती देकर संकल्प में श्री नवचंडी जपकर माता का आशीर्वाद प्राप्त करें। नवरात्रों में प्रतिदिन दुर्गा सरस्वती का ऋद्वापूर्वक विधि विधान से पाठ करने से जीवन में सुख समृद्धि प्राप्त होती है। माता रानी अपने भक्तों का कल्याण करें। बोलो दुर्गा मैय्या की जय।
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