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[07/08, 8:57 am] Himanshu: ११

 

ब्लैक होल पर शोध

 

स्टीफन के लगातार एक के बाद एक सफल प्रयोगों ने उन्हें आम आदमी से भिन्न बना दिया था। उनके मित्रतापूर्ण स्वभाव से हर कोई वाकिफ था। उनके एक सहयोगी का कहना है कि स्टीफन हमेशा स्नेह व घनिष्ठता से लोगों से मिलते थे और उनसे बातचीत करते थे। वे हमेशा अपने आपको किसी न किसी कार्य में व्यस्त रखते थे। उनका मानना था कि दिमाग को जितना व्यस्त रखा जाए, वह उतना निखरता जाता है। इस संदर्भ में वे दिमाग के धनी विख्यात भौतिक वैज्ञानिक आइंस्टाइन का उदाहरण दिया करते कि जब कभी आइंस्टाइन को आराम करने को कहा जाता था तो वे वापस अपनी लैब में चले जाते थे और कहते कि 'मुझे केवल इसी स्थान पर आकर आराम मिलता है।'

 

वे अपने कार्य के प्रति इसी तरह प्रेरित रहा करते थे। इसी के चलते 'ब्लैक होल' के संबंध में उनका शोध शुरू हो चुका था। ब्लैक होल के संदर्भ में उन्होंने अनेक तथ्यों से वैज्ञानिक जगत को अवगत कराया। यही नहीं, इस शोध के साथ-साथ वे गणित में भी रुचि लेने लग गए। उन्होंने अपने सहायक रोज़र पेनरोज़ के साथ मिलकर गणित के एक नए मॉडल का नियम प्रस्तुत किया। इसका संबंध अल्बर्ट आइंस्टाइन के रिलेटिविटी के सिद्धांत से था। इससे उन्हें गणित के अनेक गूढ़ समीकरणों को हल करने में मदद मिली। इस नियम ने ब्लैक होल के शोध में भी उनकी सहायता की। सन् 1973 में उन्होंने 'स्ट्रक्चर ऑफ स्पेस टाइम' नामक पुस्तक का लेखन किया, जिसमें उन्होंने ब्लैक होल से संबंधित जानकारी भी दी।

 

ब्लैक होल क्या है?

 

स्टीफन का कहना था कि ब्लैक होल यानी काला छिद्र, जिसे हिंदी में कृष्ण विवर भी कहा गया है। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो इसके बारे में जानते हैं। ब्लैक होल को समझने से पूर्व गुरुत्वाकर्षण बल को समझना आवश्यक है। गुरुत्वाकर्षण बल वह घटना होती है, जिसके अंतर्गत एक बल किसी दूसरे बल को अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है। इस बल के अंतर्गत सभी भौतिक वस्तुएँ जैसे ग्रह, उपग्रह तथा आकाशगंगाएँ आती हैं। गुरुत्वाकर्षण ब्रह्माण्ड में उपस्थित सभी वस्तुओं को आकर्षित करता है। सदियों पूर्व भारतीय विद्वान भास्कराचार्य ने भी कहा

 

था

 

मरुच्लो भूरचला स्वभावतो यतो विचित्रावतवस्तु शक्त्यः ॥ आ.ष्टिशक्तिश्च मही तया यत् खस्थं गुरुस्वाभिमुखं स्वशक्तत्या। आ. ष्यते तत्पततीव भाति

 

समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे ॥

 

इसका अर्थ है कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति से भारी पदार्थों को अपनी ओर खींचती है और आकर्षण के कारण ही वे जमीन पर गिरते हैं। लेकिन जब आकाश में समान ताकत चारों ओर से

[07/08, 8:57 am] Himanshu: लगे तो कोई कैसे गिरे ? अर्थात् आकाश ग्रह निरावलम्ब रहते हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती हैं।

 

वास्तव में ब्लैक होल को शोध और चर्चा का एक दिलचस्प विषय माना जाता है। इस विषय की गंभीरता से वैज्ञानिक भी परिचित हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक सम्मेलनों व वेधशालाओं में समय-समय पर इसकी चर्चा की जाती है। ब्लैक होल से संबंधित ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो मन में उठते हैं जैसे- ब्लैक होल क्या है? यह कैसे बने? इनका इतिहास क्या है? क्या वास्तव में इनका रंग काला है? कहीं ये अंतरिक्ष अथवा पृथ्वी के लिए हानिकारक तो नहीं? इत्यादि। स्टीफन ने ब्लैक होल की थ्योरी को समझने के लिए अनेक शोध किए। समय-समय पर ब्लैक होल के संबंध में उनकी मान्यताएँ भी बदलती रहीं।

 

ब्लैक होल वास्तव में अंतरिक्ष में एक ऐसा स्थान है जहाँ गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक होता है कि प्रकाश भी बाहर नहीं निकल सकता। इनका गुरुत्वाकर्षण बल कई गुना अधिक शक्तिशाली होता है। स्टीफन का कहना था कि ब्लैक होल वास्तव में कोई छेद नहीं है। ये केवल अंतरिक्ष में मृत तारों के अवशेष मात्र हैं। करोड़ों, अरबों साल गुजरने के बाद जब किसी तारे का जीवन समाप्त हो जाता है तो ब्लैक होल का जन्म होता है। यह तेज़ और चमकते हुए सूरज या किसी दूसरे तारे के जीवन का अंतिम पल होता है। इसे सुपरनोवा कहा जाता है। उस तारे में हुआ विशाल धमाका उसे तबाह कर देता है, जिससे उसके पदार्थ अंतरिक्ष में बिखर जाते हैं।

 

इन टूटे हुए कणों की चमक देखने में गैलेक्सी जैसी दिखाई देती है। मृत तारे में इतना अधिक आकर्षण होता है कि उसका सारा पदार्थ आपस में बहुत गहनता से सिमट जाता है, जो एक छोटे काले रंग की गेंद की आकृति में बदल जाता है। इसके बाद इसका कोई आयतन नहीं होता लेकिन इसका घनत्व अनंत रहता है। यह घनत्व इतना अधिक होता है कि इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। केवल सापेक्षता के सिद्धांत द्वारा ही इसकी व्याख्या की जा सकती है।

 

ब्लैक होल के खिंचाव से बच पाना संभव नहीं है। इसके आकर्षण से न तो प्रकाश बच सकता है और न ही समय । स्टीफन का मानना था कि ब्लैक होल के एक तरफ सतह होती है जिसे 'घटना क्षितिज' के नाम से जाना जाता है। इसका अर्थ यह है कि इसके आकर्षण में आकर कोई वस्तु गिर तो सकती है, किंतु बाहर नहीं आ सकती। यह अपने ऊपर पड़नेवाले संपूर्ण प्रकाश को अवशोषित कर लेता है। इसके संदर्भ में कहा जाता है कि यह अंतरिक्ष में स्थित एक ऐसा वर गर्त (गड्ढा) है, जिसमें फँसकर हम किसी अन्य ग्रह में पहुँच सकते हैं।

 

ब्लैक होल में समय का कोई अस्तित्व नहीं होता। जब कोई वस्तु धीरे-धीरे ब्लैक होल के नज़दीक आती है तो समय की गति धीमी होती जाती है और ब्लैक होल में प्रवेश करने के दौरान समय का अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

 

लोगों के मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि यदि कोई वस्तु ब्लैक होल के अंदर जाती है तो उसके साथ क्या होता है? ब्लैक होल में गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होने के कारण उसकी सीमा में आई वस्तु पर आकर्षण बल अधिक लगेगा। इसके फलस्वरूप, ब्लैक होल की सीमा में जानेवाली वस्तु छोटे-छोटे भागों में बँट जाती है क्योंकि गुरुत्वाकर्षण बल इतना अधिक होता है कि कोई वस्तु इतना गुरुत्व बल सहन ही नहीं कर सकती। स्टीफन ने ऐसे अनेक रहस्यों से पर्दा उठाया और अपने शोध द्वारा करोड़ों लोगों की शंकाओं का समाधान किया।

[07/08, 8:57 am] Himanshu: १०

 

ब्रह्माण्ड का निर्माण

 

स्टीफन का मानना था कि बह्माण्ड आज भी मनुष्य के लिए एक अबूझ पहेली है। यहाँ प्रत्येक क्षण कोई न कोई ऐसी घटना घटित होती रहती है, जिसे जानकर हमारा मस्तिष्क उसकी गहराई तक जाने का प्रयास करता है। प्रकृति ने कुछ इंसानों को जिज्ञासु प्रवृत्ति का बनाया है। उन्हें ऐसा मस्तिष्क प्रदान किया है कि वे हमेशा कुछ न कुछ सोचते रहते हैं। दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि प्रकृति ने मनुष्य को मस्तिष्क के रूप में एक अनमोल उपहार दिया है। यदि मस्तिष्क का सही रूप से इस्तेमाल किया जाए तो यह इतना सक्षम है कि गूढ़ से गूढ़ रहस्यों की तह तक जाकर उसके बारे में जानकारी हासिल कर सकता है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि एक सामान्य व्यक्ति अपने मस्तिष्क का 10 प्रतिशत तक ही इस्तेमाल करता है। ज़रा सोचिए, यदि कोई अपने मस्तिष्क का 40 से 50 प्रतिशत तक इस्तेमाल करने लग जाए तो वह सृष्टि के अनेक अनगिनत व अनसुलझे रहस्यों का पता लगाने में कामयाब हो जाएगा।

 

एडिंग्टन ने ब्रह्माण्ड के बारे में लिखते हुए इस बात पर जोर दिया था कि एक समय आएगा जब लोग ब्रह्माण्ड के रहस्यों के बारे में बहुत गहनता से खोजबीन करेंगे क्योंकि ब्रह्माण्ड की दुनिया एक रहस्यमयी दुनिया है। ब्रह्माण्ड न जाने कितनी सदियों से मानव को आकर्षित करता आ रहा है। इसी आकर्षण ने खगोल वैज्ञानिकों को ब्रह्माण्डीय प्रेक्षण और ब्रह्माण्ड अन्वेषण के लिए प्रेरित किया है।

 

वर्तमान में किए गए खगोलीय अनुसंधानों तथा क्रांतिकारी प्रयोगों ने ब्रह्माण्ड के अनेक अनसुलझे रहस्यों से हमें परिचित कराया है। स्टीफन भी जीवनभर इसी दिशा में कार्य करते रहे। उन्होंने विज्ञान की सभी शाखाओं में भौतिक विज्ञान को सबसे उच्च माना। ब्रह्माण्ड के बारे में नित नए प्रयोग व शोध करना उनका प्रिय विषय था।

 

ऐसा माना जाता है कि आज से लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व ब्रह्माण्ड का कोई अस्तित्व नहीं था। पूरा ब्रह्माण्ड एक बहुत ही सूक्ष्म सघन बिंदु में सिमटा हुआ था। बिंदु के अंदर उत्पन्न दबाव के कारण, उसमें अचानक एक जबरदस्त विस्फोट हुआ और यह बिंदु बिखर गया, जिससे ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया। यह विस्फोट बहुत शक्तिशाली था। उस समय ब्रह्माण्ड के तापमान का अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। इस विस्फोट के बाद के एक माइक्रो सैकेंड से भी कम समय को 'ब्लैंक टाइम' कहा जाता है। इस ब्लैंक टाईम से कम समय में ब्रह्माण्ड का तापमान तेज़ी से नीचे गिरा और एक माइक्रो सैकेंड होते-होते ब्रह्माण्ड की आयु लगभग दस हजार अरब प्रकाश वर्ष की हो गई।

 

इस विस्फोट के पश्चात चारों ओर अंधकार ही अंधकार था। उस समय किसी प्रकार का प्रकाश भी नहीं था। प्रकाश न होने का कारण यह था कि ब्रह्माण्ड प्लाज्मा की अवस्था में था और इसके अणु भी नहीं थे। लगभग 3.80 लाख वर्षों तक ब्रह्माण्ड अंधकार में रहा। इस दौरान बह्माण्ड में प्रोटॉन व न्यूट्रॉन बनने की प्रक्रिया चलती रही। जिस समय प्रोटॉन व न्यूट्रॉन के मिलने से पहला अणु उत्पन्न हुआ, वह हाइड्रोजन था, जिसने ब्रह्माण्ड के निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया। गुरुत्वाकर्षण के कारण हाइड्रोजन व हाइड्रोजन से मिलनेवाले हीलियम के अणु बनने की प्रक्रिया भी आरंभ हो चुकी थी।

 

इसके बाद ब्रह्माण्ड में सबसे पहले तारे का आगमन हुआ और वह तारा 'सूर्य' था। सूर्य की उत्पत्ति होने से ब्रह्माण्ड में पहली बार प्रकाश उत्पन्न हुआ और अंधकार समाप्त हुआ। सूर्य के बाद अनेक तारों की उत्पत्ति होने लगी और बह्माण्ड पूर्ण रूप से अपने अस्तित्व में आ गया। ब्रह्माण्ड के प्रकाशमान होने के समय से लेकर आज तक यह

[07/08, 8:58 am] Himanshu: हजार गुना अधिक विस्तार ले चुका है।

 

ब्रह्माण्ड में हुए इस विस्फोट को बिग बैंग का नाम दिया गया। इस महाविस्फोट के प्रारंभिक क्षणों में क्वार्क और फोटोन का गर्म द्रव्य बन चुका था। ‘आदि पदार्थ (Primitives)' व प्रकाश का मिला-जुला यह गर्म लावा तेज़ी से चारों तरफ फैलने लगा। देखते ही देखते कुछ ही क्षणों में ब्रह्माण्ड व्यापक हो गया। लगभग चार लाख साल बाद में इसके फैलने की गति धीरे-धीरे कुछ धीमी हुई। ब्रह्माण्ड थोड़ा ठंडा व विरल हुआ और सूर्य का प्रकाश बिना किसी पदार्थ से टकराए लंबी दूरी तय करने लगा। अब चंद्रमा, तारे, धूमकेतु, उल्का, ग्रह व अनेक आकाशीय पिंडों का निर्माण होना शुरू हो गया, जिसे सौरमंडल कहा जाता है। हमारी पृथ्वी भी इस प्रक्रिया के दौरान अस्तित्व में आई। लेकिन उस समय इसका स्वरूप ऐसा नहीं था, जैसा कि वर्तमान में देखने को मिलता है।

 

हमारी पृथ्वी भी किसी समय सूर्य के समान अत्यंत गर्म आग का एक गोला थी। यदि किसी ने उस समय इसे देखा होता तो यह अंदाजा लगाया जाना नामुमकिन था कि इस पर कभी जीवन भी संभव हो सकता है। वह अपनी धुरी पर तेज़ी से घूमा करती थी और एक दिन केवल 8 घंटे का होता था। उस समय पृथ्वी पर पानी भी नहीं था लेकिन हवा में भाप के कण व H2O जैसे सभी तत्व मौजूद हुआ करते थे।

 

जब ब्रह्माण्ड के बनने की प्रक्रिया समाप्त हुई तो तापमान तेज़ी से कम होना शुरू हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि पृथ्वी के तापमान में भी गिरावट आने लगी। अंततः वायुमंडल में मौजूद भाप के कण बरसात के रूप में नीचे गिरने लगे। लाखों वर्षों तक यह बरसात होती रही। इससे बड़े-बड़े समुद्रों व महासागरों का निर्माण हुआ। इसके बाद लगभग 3.5 अरब वर्ष पूर्व पानी में हाइड्रोजन, ऑक्सीजन व कार्बन के मिलने से ‘जीवन’ संभव हो सका। पृथ्वी पर पैरामीशिय व अमीबा जैसे एककोशीय जीव बनने लगे। धीरे-धीरे छोटे जीवाणुओं के कारण बहुकोशीय जीवों का निर्माण भी होने लगा। देखते ही देखते पृथ्वी पर अनेक प्रकार के जीव-जंतुओं के साथ इंसानों का जन्म भी होने लगा।

 

बिग बैंग के सिद्धांत को आधुनिक भौतिकी (मॉडर्न फिज़िक्स) में जॉर्ज हेनरी द्वारा लिखा गया। वे रोम के एक कैथोलिक गिरजाघर में पादरी थे और वैज्ञानिक भी थे। यह एक साधारण-सा सिद्धांत था जो अल्बर्ट आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत पर आधारित था। यह विस्फोट दो प्रमुख धारणाओं पर आधारित था। पहला- भौतिक नियम व दूसरा- ब्रह्माण्डीय सिद्धांत। इसके बाद अनेक वैज्ञानिकों ने विभिन्न सिद्धांतों की रचना की व ब्रह्माण्ड से जुड़े अनेक रहस्यों से पर्दा उठाया। लेकिन जहाँ तक ब्रह्माण्ड के सभी रहस्यों की तह तक जाने की बात है, उसमें अभी समय लग सकता है।

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