नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अमित, और मै मूल रूप से उत्तराखंड के पौडी जिले के द्वारिखाल विकासखंड का रहने वाला हूँ। यहाँ पर आज मै अभी आपको अपने बारे मे अभी तक का अपनी जिंदगी का सफर थोड़ा से संक्षेप मे बता रहा हूँ। आगे की जानकारी मे मै आपको अपने उत्तराखंड और मुख्य रूप से गढ़वाल से जोड़ने का प्रयास करूंगा और साथ ही हमारी जो विलुप्त होती सभ्यता और संकृति है उससे भी आपको जोड़ने का प्रयास और उसकी जानकारी समय समय पर इस ब्लॉग के माध्यम से प्रदान करने की कोशिश करूंगा। बस आप सभी लोग अपना प्यार और आशीर्वाद बनाए रखें।
ऊपर आप जो पिक्चर देख रहे हैं है ये मेरा गाँव है,जब मै पाँच साल का था तब हम 1992 में मूलभूत सुविधाओं के अभाव मे गाँव से आंशिक रूप से पलायन कर गए थे। चूंकि मेरे पिताजी भारतीय सेना मे कार्यरत थे अतः हम लोग 1992 मे उत्तरप्रदेश के आगरा शहर मे आ गए थे जहां पर हमको सेना का ही एक सरकारी मकान रहने के लिए मिल गया था।
आपको बता दूँ कि हम चार भाई बहन(2 भाई और 2 बहन) थे और उन सब मे से मै सबसे छोटा था।, और हम सभी भाई बहनों मे सबसे बड़े मेरे मेरे भाई थे। जब मै आगरा आया था तो उस समय मेरी उम्र लगभग पाँच साल की थी। लेकिन चूंकि गाँव में हमारी गाय और कुछ और पालतू जानवर भी थे तो उनकी देखभाल के लिए बड़े भाई छोटी दीदी और मेरी दादी गाँव मे ही रुक गए थे, चारों भाई बहनों मे से सिर्फ बड़ी दीदी और मै ही माँ और पिताजी के साथ आगरा आए थे। बड़े भाई और छोटी दीदी गाँव कि स्कूल मे ही पढ़ने जाते थे।
आगरा शहर आने के बाद हम सरकारी मकान मे रहने लगे थे। पहले तो मेरे को वो जगह कुछ अजीब सी लगी क्योंकि वहाँ न तो मेरा कोई दोस्त था और न ही वहाँ मे किसी को जानता था और मेरे लिए वो जगह नयी और अंजान भी थी। लेकिन अब हम गाँव के साफ और स्वछ वातावरण और मीठी हवा से दूर शहर मे आ गए थे जहां पर गाँव के जैसे ने तो पहाड़ थे और न ही वो ताजी हवा। अब हम पहाड़ों की खूबसूरती से दूर एक भीड़भाड़ वाले और अंजान शहर मे आकर रहने लगे थे। उस इलाके मे सब सेना के जवानों के अनेक परिवार ही रहते थे जिनमे कुछ हमारे उत्तराखंड से थे , कुछ नेपाल से तो कुछ परिवार असम से भी थे।
इस प्रकार इसी जान पहचान के सिलसिले मे कुछ समय बाद पड़ोस के कुछ लड़कों से अपनी दोस्ती हो गयी थी। जिनमे एक नैपाली दोस्त था जिसका नाम था पारस । फिर एक दोस्त और मिला राजू ,और कुछ समय बाद एक और दोस्त बन गया नवीन जो उत्तराखंड से ही था। हम लोग सभी लगभग एक ही उम्र के थे और बहुत मस्ती किया करते थे। हम सब एक अच्छे दोस्त बन गए थे। इस फोटो मे उस समय आगरा की यादगार है, बीच मे मै हूँ और मेरे दाहिने तरफ मेरा दोस्त पारस और बाई तरफ मेरी बड़ी दीदी है।
हमारे सरकारी आवासों के पास ही पीछे कि तरफ सड़क थी जिसके दूसरी और सेना के जवानों का पीटी का मैदान था वहाँ पे सेना के जवान रोज सुबह-सुबह शारीरिक कसरत और जरूरी सैनिक अभ्यास किया करते थे उनको देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता था। उस मैदान मे सैनिकों के लिए जो अभ्यास के जो तरीके थे हम लोग भी उसको आजमाना चाहते थे वो हमको बहुत मजेदार और रुचिकर लागने लगे।
सच कहूँ दोस्तों जिस प्रकार के सैनिकों के वो अभ्यास के तरीके थे वो तरीके हम छोटे बच्चों के लिए तनिक भी आसान नहीं थे और उन तरीकों से अभ्यास करना हम बच्चों के लिए बहुत मुश्किल था लेकिन हम भी सैनिक के बच्चे थे ऐसे कैसे हार मान जाते, हमारे अंदर भी अब उन सब अभ्यास को करने का शैतानी जुनून हावी हो चुका था ।अब तो हम तीनों ने ही उपाय निकाला की जैसे ही सुबह सुबह सैनिको का अभ्यास खत्म होगा उनके जाने के तुरंत बाद हम भी उस मैदान मे हाथ आजमाएँगे।
इस तरह हम लोग रोज सुबह जल्दी उठकर उस मैदान मै चुपके से हवलदार अंकल की नजरों से बचकर आने -जाने लगे थे। बड़ी बड़ी रस्सियों पर लटककर एक जगह से दूसरी जगह कूद मारना, कंटीली तारों के बीच से सरकते हुए आगे बढ़ना, बहुत सारी छोटी-छोटी रस्सियों को पकड़कर एक जगह से दूसरे जगह जाना, टायरों के बने ऊंचे-ऊंचे जालों पर चढ़कर दूसरी तरफ उतरना, ऊंचे जगह पर चढ़कर नीचे रेतीली सतह पर कूद मारना आदि , जैसे फौजी लोग करते थे वैसी ही बहुत से गतिविधियां हम उस मैदान मै करने की कोशिश करते थे। हमको ऐसा करना बहुत अच्छा लगता था। बहुत अच्छे से तो नहीं लेकिन कुछ हद तक हम लोग वो सभी अभ्यास कर लेते थे। इस तरह अब हम रोज सुबह उस जगह पर आने लगे थे, लेकिन किस्मत कब तक साथ देती। एक दिन हवलदार अंकल की नजर हम पर पड़ ही गयी। हवलदार अंकल को देखकर हमारी सिट्टी पिट्टी गुम हो गयी।...............
आगे के अंक मे जानिए कि जब हवलदार को हमारी हरकतों का पता चला तो फिर क्या हुआ.....
बहुत बढ़िया आगे की कहानी का इंतजार रहेगा
dhanyabad yogesh ji
You must be logged in to post a comment.